73वें संविधान संशोधन अधिनियम की आलोचनात्मक समीक्षा, Critical review of the 73rd Constitutional Amendment Act 1992, 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के महत्व क्या है, 73 वां संविधान संशोधन राजस्थान में कब लागू हुआ, 73वां संविधान संशोधन कब लागू हुआ था, त्रिस्तरीय पंचायती राज क्या है, 73 व संविधान संशोधन क्या है, पंचायती राज व्यवस्था कितने स्तरों पर लागू की गई है, क्या तीन स्तरीय संरचना के रूप में 73 संशोधन में विस्तार से बताया है, संविधान के संशोधन में कौन सी संस्थाएं सम्मिलित नहीं होती, 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार पंचायत का कार्यकाल कितना होता है, 12वीं अनुसूची में क्या है?
73वें संविधान संशोधन अधिनियम की आलोचनात्मक समीक्षा


73वें संविधान संशोधन अधिनियम की आलोचनात्मक समीक्षा

 

73वें संविधान संशोधन में प्रावधान था कि एक वर्ष के अंदर आदिवासी क्षेत्रों के लिए संसद में विधेयक लाया जाएगा लेकिन अफसोस की बात यह रही एक वर्ष क्या इस बारे में अधिनियम 24 दिसम्बर, 1996 को जाकर लागू हुआ। इससे स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए कितनी तत्पर है। इस विधेयक का महत्वपूर्ण पहलू है कि यह गांव की जगह समुदाय को स्वशासन की मूलभूत इकाई के रूप में स्वीकारता है। इसके अतिरिक्त आदिवासियों में खनिजजलजंगल व जमीन पर स्वामित्व व नियंत्रण का अधिकार समुदाय को ही प्रदान करता है।


राज्य सरकारों को इस अधिनियम को को ध्यान में रखकर एक वर्ष के अंतर्गत अपने पंचायत अधिनियम में संशोधन करने थे लेकिन राजस्थान में तो जून, 1999 में विधेयक लाकर इसे लागू किया गया। इस अधिनियम को लागू करने में कुछ केंन्द्रीय और राज्य कानूनों से संबधित कुछ मुद्दों का वर्णन निम्न प्रकार हैः लघु वन उत्पाद की परिभाषा-भारतीय वन अधिनियम, 1927 में इमारती लकड़ी की परिभाषा में बांस और बेंत को शामिल किया गया है। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इमारती लकड़ी को शामिल किया गया है। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इमारती लकड़ी को शामिल करते समय भारतीय वन अधिनियम, 1927 में की गई इमारती लकड़ी की परिभाषा को अपनाने का निर्णय लिया है जिसके अनुसार इमारती लकड़ी में न केवल वृक्ष बल्कि बांस और बेंत भी शामिल हैं। अधिकांश राज्यों में आदिवासी लोग अपनी आजीविका के लिए बांस और बेंत पर परंपरागत रूप से आश्रित हैं तथापि पिछले कई वर्षों से वन निगमों और वन विभागों ने आदिवासियों को जंगल से बांस और बेंत लेने से रोका हैजबकि यही वस्तुएं उच्च रियायती दरों पर निजी उद्योग को बेची हैं। अनेक मामलों में राज्य वन विभागों की इस नीतियों के कारण आदिवासियों में निराशा उत्पन्न हुई है।

ग्राम सभा को लघु वन उत्पाद का स्वामित्व सौंपने के संबंध् में अनेक मुद्दे उभरे हैं। पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा किए गए प्रस्तावों में संसद के आशय की व्याख्या में स्वामित्व को स्वाभाविक स्वामित्व देना नहीं माना गया है बल्कि इसे राज्य वन निगम परिसंघ के शेष लाभ को ग्राम सभा को देना माना गया है। इसका अर्थ यह है कि पर्यावरण व वन मंत्रालय के अनुसार राज्य वन निगम परिसंघ लघु वन उत्पाद में व्यवसाय करते रहेंगे। यदि कुछ बच जाता है तो उसे ग्राम सभाओं को दे दिया जायेगा। ग्रामीण मंत्रालय ने इन मुद्दो को पर्यावरण और वन मंत्रालय के साथ उठाया और इस व्याख्या की कानूनी वैधता के बारे में विधि् मंत्रालय से परामर्श भी मांगा है। महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों वन उत्पाद व्यवसाय अधिनियमो के लागू रहने से अधिनियम 40, 1996 के प्रावधनों का उल्लंघन होता है क्योंकि इसमें ग्राम सभा में निहित लघु वन उत्पाद पर नियंत्रण का अधिकार कम हो जाता है।

विधि् मंत्रालय के अनुसार कानून में दी गई परिभाषा कानून के उपबंधें को कर्यान्वित करने के लिए हैन कि दूसरे कानून के उपबंधें को कार्यान्वयन करने के लिए। सामान्य अधिनियम और जनरल क्लाज एक्ट, 1897 की परिभाषाओं को छोड़कर अन्य अधिनियम, 1927 में भी गौण वन उत्पादों को परिभाषित नहीं किया गया है। यह कहा जाता है कि इस कानून के अंतर्गत वन उत्पादों की परिभाषा में मुख्य रूप से दो तत्व शामिल हैं अर्थात इमारती लकड़ी के अलावा सभी वन उत्पाद। जबकि पंचायत उपबंध् क्षेत्र, 1996 में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि भारतीय वन अध्नियम 1927 में दी गई वन उत्पाद’ शब्द की परिभाषा उक्त अधि् नियम पर लागू होगी।

स्वामित्व के प्रश्न पर विधि् मंत्रालय ने सलाह दी है कि कोई भी मंत्रालय 1996 के अधिनियम 40 में पंचायत को सांपे गए स्वामित्व के क्षेत्र को सीमित या प्रतिबंधित नहीं कर सकता है।

73वें संविधन संशोधनइसके विस्तार अध्नियम, 1996 जो अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित हैकी मुख्य विशेषताओं के आलोचनात्मक अध्ययन से स्पष्ट है कि 73वें संविधान संशोधन के अनुसार पंचायतों को कार्यशक्ति देने का अधिकार अधिनयम में चिन्हित न करके राज्य सरकार की इच्छा पर छोड़ दिया गया है। जबकि 73वें संविधान संशोधन का विस्तार अधिनियम में आदिवासियों को उनके क्षेत्रों के विकास के लिए योजना बनाने व क्रियान्वयन के अलावा खनिजजल संयत्र व जमीन पर स्वामित्व प्रदान किया है। इस प्रकार इन दोनों अधिनियमों को तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो विस्तार अध्नियम 73वें संविधान संशोधन से अधिक प्रगतिशील है।

 

पंचायती राज अधिनियमों की समीक्षाः

73वां संविधान संशोधन विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद 24 अप्रैल, 1993 को अध्नियम बना। अधिनियम बनने के एक वर्ष के भीतर सभी राज्यों को अपने पंचायती राज अधिनियमों को 73वें संशोधन को ध्यान में रखकर बदलना था। सभी राज्यों ने ऐसा किया। 73वें संविधान में पंचायतों की संरचनागठनवित्त अयोग व चुनाव आयोग के गठन के अलावा महत्वपूर्ण प्रावधान अनिवार्य प्रावधान पंचायतों को अधिकार व शक्तियां प्रदान करना था। अधिनियम में इनका खुलासा न करके इस प्रावधन को राज्यों के विधानमंडल पर छोड़ दिया गया था। इस प्रकार यह प्रावधान अनिवार्य प्रावधान नहीं था। इसके अतिरिक्त पंचायत प्रावधान,अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम, 1996 के द्वारा 73वें संविधान संशोधन को देश के आठ अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तारित किया गया है।

 

ग्राम सभा 

ग्राम सभा समस्त पंचायती राज व्यवस्था का दिल व दिमाग है। लेकिन पंजाबतमिलनाडुमध्य प्रदेश तथा केरल को छोड़कर अन्य प्रदेशों में इस संस्था को मात्रा बातचीत की संस्था बनाकर रख दिया है। मध्यप्रदेश ने ग्राम सभा को सशक्त बनाने के लिए पंच एवं सरपंच को वापस बुलाने का अधिकार भी संस्था के हाथ में दे दिया है। अधिकतर राज्यों में ग्राम सभा को ग्रामीण विकास संबंधित कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने में सहायता प्रदान करनाविभिन्न गरीबो हटाओं कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों को चुननागांव में एकता व सौहार्द का वातावरण बनान तथा ग्राम पंचायत द्वारा पिछले वर्ष का लेखा-जोखा तथा आने वाले वर्ष के कार्यक्रम आदि के अनुमोदन का अध्किर दिया है। चूंकि ग्राम सभा को कोई विशेष शक्ति व अधिकार नहीं हैइसलिए आम लोग इसमें जाने से कतराते हैं। गरीब परिवार के लोग कहते देखे गए हैं कि ग्राम सभा की बैठक के चक्कर में वे अपनी मजदूरी नहीं गंवाना चाहते है।

लेकिन जग ग्राम सभा की बैठक में गरीब परिवारों के लिए इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत मकान वितरित करने या विभिन्न ग्रामीण विकास योजनाओं के अंतर्गत लाभार्थियों के चुनने का एजेंडा रहता हैतब ग्राम सभा की बैठकों में लोगों की भागीदारी बढ़ जाती है। अधिनियम, 1996 जो पंचायत प्रावधनों का अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार के बारे में हैने ग्राम सभा को सही मायने में सशक्त बनाया है। लेकिन यह केवल नौ राज्यों क्रमशः आन्ध प्रदेशउड़ीसाझारखण्डमध्यप्रदेशछत्तीसगढ़महाराष्ट्रगुजरातराजस्थान व हिमाचल प्रदेश में ही लागू है।

 

पंचायतों का गठन

73वें संविधान संशोधन के अनुसार तीन स्तरीय पंचायतों के गठन का प्रावधन है। लेकिन उन राज्यों में जिनकी आबादी 20 लाख से कम हैदो स्तरीय प्रणाली के लिए कहा है। इसलिए गोवा व मणिपुर में दो स्तरीय पंचायती राज प्रणाली का प्रावधान है। पंचायतों के गठन में केरलमहाराष्ट्र व गुजरात को छोड़कर सभी राज्यों ने सांसदों व विधयकों को पंचायती राज के मध्य व उच्च स्तर पर सदस्यता का प्रावधान किया है। सांगठनिक स्तर पर एक अन्य विभिन्नता निचले स्तर की पंचायतों के प्रतिनिधियों को ऊपर के स्तर की पंचायतों में प्रतिनिध्त्वि प्रदान करने की भी है।

 

आरक्षण

73वें संविधान संशोधन ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में व महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधन किया है। इस प्रावधान को राज्यों के लिए अनिवार्य प्रावधान नहीं था। इसलिए लगभग सभी राज्यों में पिछड़ों के आरक्षण का प्रावधान तो है लेकिन आरक्षण के प्रतिशत में विभिन्नता है। कहीं यह 27 प्रतिशत है तो कहीं उनकी जनसंख्या के आधार पर है। संपूर्ण राज्यां में अकेला राज्य आन्ध् प्रदेश ही है जहां अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का प्रावधान है।

 

कार्य व शक्तियों का बंटवारा 

राज्य पंचायती राज अधिनियमो का अवलोकन करने से पता चलता है कि पंचायतों के तीनों स्तरों को महत्वपूर्ण कार्य नहीं दिए गए हैं। कुछ राज्यों ने तो संविधन की 11वीं अनुसूची को ध्यान में रखकर पंचायतों के तीनों स्तरों पर कार्य आबंटन करने के बजाय हूबहू 11वीं अनुसूची को ही पंचायती राज अधिनियम में रख दिया है। आन्ध्र प्रदेश सरकार ने ग्राम पंचायतों को विकाससामाजिक संपति का रखरखाव तथा जन सुविधाओं से संबंधित कार्य दिए हैं। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार अनुसूची 1 में उल्लिखित कार्य भी ग्राम पंचायत को दे सकती है। अनुसूची 1 और कुछ नहीं 73वें संविधान संशोधन की 11वीं अनुसूची की नकल है। यहीं स्थिति मंडल पंचायत तथा जिला परिषद की भी है।

 

वित्तीय साधन

पंचायतों के पास कार्य संपन्न करने के लिए पर्याप्त वित्तीय साधन होने आवश्यक हैं। विभिन्न पंचायती राज अधिनियम के वित्त संबंधी प्रावधानों को देखने से स्पष्ट है कि बिहारगुजरातहरियाणापंजाबव उत्तर प्रदेश राज्यों ने कर लगाने की शक्ति ग्राम पंचायतों को सौंपी है। आन्ध् प्रदेशगोवाहिमाचल प्रदेशमध्य प्रदेशउड़ीसा व तमिलनाडु में जिला स्तर पर कर लगाने की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट नहीं है। राज्य पंचायत अधिनियमों में अनेक जगह किन्तु व परंतु है जिससे क्या-क्या कर लगाने हैं साफ तौर से पता नहीं चलता। महाराष्ट्रकेरलबिहारगोवा एवं महाराष्ट्रत्रिपुरा आदि में भी राज्य सरकारजिलाब्लॉक एवं ग्राम पंचायतों के बीच वित्तीय साध्नों के बंटवारे का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

 

नियंत्रण प्रक्रिया

पंचायतों को स्वायत्त शासन की संस्थाएं बनने के लिए आवश्यक है कि वे नियंत्रण मुक्त वातावरण में कार्य करें। इसके अतिरिक्त कार्य को प्रभावी ढंग से करने के लिए उनके खुद के पास पर्याप्त कर्मचारी हों। राज्य के पंचायती राज अधिनियमों में पंचायातों का निरीक्षण करनेपंचायतों को निरस्त करनेपंचायतों को निर्दिष्ट देनेपंचायत प्रतिनिध्यिं को निरस्त करने से संबंध्ति अनेक प्रावधान हैं। असम व कर्नाटक में आयुक्त कोगोवाहरियाणापंजाब में निदेशक पंचायती राज कोअरुणाचल प्रदेशबिहारकेरल व मणिपुर में राज्य सरकार द्वार निर्धारित प्राधिकरण को सरपंचों को हटाने व निरस्त करने का अध्किर है। महाराष्ट्र में स्थायी समिति व राजस्थान में जिला परिषद् के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी को यह अधिकार है कि वह चाहे तो सरपंच को पदमुक्त कर दे। आन्ध्र प्रदेश में राज्य सरकार आयुक्त और जिला कलेक्टर को पंचायती राज अधिनियम की अनेक धराएं पंचायतों के तीनों स्तरों पर नियंत्रण की शक्ति प्रदान करती हैं। मध्य प्रदेश में भी राज्य सरकार का पंचायतों पर नियंत्रण है। इसी प्रकार के प्रावधान लगभग सभी राज्यों में हैं।

 

जिला नियोजन समिति

जिला स्तर पर नियोजन समिति बनाने का प्रावधान है। यह समिति ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों के लिए बनी योजनाओं को समन्वित करके संपूर्ण जिले की योजना बनाएगीइसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण समिति है। अतः सभी राज्यों ने इसका प्रावधान किया है। लेकिन इसका अध्यक्ष कौन होगा इस संबंध् में कुछ भी नहीं कहा गया है। कुछ राज्य जैसे- केरलराजस्थानअसमबिहार आदि ने जिला पंचायत के अध्यक्ष को इस समिति का अध्यक्ष बनाया हैलेकिन अध्कितर राज्यों में तो मंत्री या जिलाधीश को इसका अध्यक्ष बनाया गया है।

 

पंचायत अनुबंध् अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम, 1996

 

73वें संविधन संशोधन को देश की पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में पंचायत अनुबंध अनुसूचित क्षेत्र में विस्तार अधिनियम, 1996 के द्वारा विस्तारित किया गया। इस अधिनियम ने अनुसूचित क्षेत्रों के जलजंगल व जमीन का अधिकार ग्राम सभा को दिया है। इस अधिनियम को ध्यान में रखकर सभी राज्यों ने अपने अधिनियमों में बदलाव किए हैं। लेकिन इस अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए वन अधिनियमराज्य सीमा शुल्क अधिनियमलघु खनिज अधिनियमकिसी राज्य आदि किसी राज्य को भी बदलने की जरूतरत है। मध्य प्रदेश के अतिरिक्त अन्य ने पूर्ण रूप से इस दिशा में आवश्यक कदम नही उठाए हैं।

 

निष्कर्ष

73वें संविधन संशोधन नें पंचायतों का अनिवार्य प्रावधानों के माध्यम से ढांचा तो खड़ा कर दिया लेकिन ढांचे को जीवंत बनाने के लिए मांस व रक्त बनाने का प्रावधन ऐच्छिक प्रावधानों के माध्यम से राज्यों पर छोड़ दिया हैजिसके कारण राज्य सरकारों ने पंचायतों को जीवंत बनाने में घर बार सब तुम्हारा कोठी कुठले को हाथ मत लगाना’ वाली कहावत को चरितार्थ किया हैक्योंकि उन्होंने अधिकार व शक्तियां के नाम पर पंचायतों को अंगूठा दिखा दिया है। लेकिन कुछ राज्यों जैसे केरल व मध्य प्रदेश ने पंचायतों को स्वायत्त शासन को संस्थाएं बनाने के लिए सकारात्मक कदम उठाए हैं। हम आशा करते हैं कि भविष्य में इस कार्य के प्रदर्शन का प्रभाव अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा।


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