पंचायती राज व्यवस्था से संबंधित समितियां, पंचायती राज : उपलब्धियां और चुनौतियां,  पंचायती राज का जनक, त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था,  भारत में पंचायती राज की भूमिका, पंचायती राज की समितियां, त्रिस्तरीय पंचायती राज क्या है?, बलवंत राय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति की रिपोर्ट, जी.के.वी.राव समिति की रिपोर्ट, एल.एम.सिंघवी समिति की रिपोर्ट, पी.के. थुंगन समिति, Committees Related to Panchayati Raj
पंचायती राज व्यवस्थाः पंचायती राज से सम्बंधित समितियां



पंचायती राज व्यवस्थाः पंचायती राज से सम्बंधित समितियां

भारत गांव का देश है गांवों के उन्नत एवं प्रगति पर ही भारत की उन्नति एवं प्रगति निर्भर करती है। गांधी जी ने ठीक ही कहा था कि, ‘यदि गाँव नष्ट होते हैं तो भारत नष्ट हो जायेगा।’ वस्तुतः हमारा जनतंत्र इस बुनियादी धारा पर आधरित है कि शासन के प्रत्ये स्तर पर जनता अधिक से अधिक कार्यों में हाथ बंटाये और राज करने की जिम्मेदारी स्वयं उठाये। भारत में जन तंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि ग्रामीण जनो का शासन से कितनी अधिक प्रत्यक्ष और सजीव संपर्क स्थापित हो जाता है। पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने ठीक ही कहा था कि, ‘यदि हमारे स्वाधीनता को जनता की आवाज की प्रतिध्वनि बनना है तो पंचायतों को जितनी अधिक शक्ति मिले जनता के लिए उतना ही भला है।


नेहरू को लोकतांत्रिक तरीकों में अटूट विश्वास था। सन् 1952 में उन्हीं के पहल पर सामुदायिक विकास कार्यक्रम आरंभ हुआ। इस कार्यक्रम का आरंभ इसलिए किया गया था ताकि आर्थिक नियोजन एवं सामाजिक पुनरूधार की राष्ट्रीय योजना के प्रति देश की ग्रामीण जनता में सक्रिय रूचि पैदा की जा सके। परंतु सामुदायिक विकास के सरकार द्वारा प्रेरित एवं प्रायोजित कार्यक्रम में ग्रामीण जनता को नियोजन की परिधि में लाकर खड़ा कर दिया। परंतु ग्रामीण स्तर पर योजना के क्रियान्वयन में उसे इच्छुक पक्ष नहीं बनाया जा सकता। यह कार्यक्रम सरकारी तंत्र और ग्रामीण जनता के बीच की दूरी कम करने की मुख्य उद्देश्य में विफल रहा।

क्योंकि -

1. इससे सरकारी महकमे की तरह चलाया गया।

2. गाँव के विकास के बजाय सामुदायिक विकास की सरकारी मशीनरी के विस्तार पर ही ज्यादा जोड़ दिया गया।

3. सामुदायिक विकास की सबसे बड़ी कमजोरी उसका सरकारी स्वरूप और नेताओं के लफ्फाजी थी। कार्यक्रम जनता को चलाना था लेकिन वे ऊपर से बनाये जाते थे।

देश आजाद हुआसंविधान बन गया। पंचायतें उसका अंग बनीं। विभिन्न राज्यों में राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आई। उन्होंने पंचायतें स्थापित करने व उन्हें सशक्त बनाने की बात की। पंचायतें गठित भी हुई। लेकिन वास्तव में जमीनी तौर पर कुछ नहीं हुआ।

कारण यह है कि वे सही अर्थों में स्वायत्त शासन की संस्थाएं नहीं बन सकीं। अगर विभिन्न राज्यों में पंचायतें बनीं तो उन पर राज्य का नियंत्रण रहा। कोई कर लगाना हो या अन्य कोई कार्य करना होहर बात के लिए सरकार से अनुमति लेनी होती थी और इसमें राज्य स्तर से कोई सहयोग पंचायतों को नहीं मिला। इसलिए जो कार्य पंचायतों को सौंपे गए उन्हें वे पूरा नहीं कर सकीं और कुल मिलाकर सत्ता के केन्द्रीकरण की बात कागजों तक सीमित होकर रह गई।

 

बलवंत राय मेहता समितिः

सामुदायिक विकास व राष्ट्रीय विस्तार सेवा की विफलता के बाद बलवंतराय मेहता की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। जिसने अपनी रिपोर्ट 24 नवम्बर, 1957 को सरकार के सम्मुख प्रस्तुत की। इस समिति को गठित करने का प्रयोजन यह पता लगाना था कि लोगों में पंचायतों के प्रति उत्साह क्यों कम है तथा इस समस्या से पार पाने के लिए क्या तरीके अपनाए जाने चाहिए।

इस समिति का प्रमुख निष्कर्ष यह था कि आम लोगों को ग्रामीण विकास योजनाओं में भागीदार बनाने के लिए योजना व प्रशासनिक सत्ता दोनों का विकेन्द्रीकरण होना आवश्यक है। अर्थात् पहली बार विकेन्द्रीकरण के साथ लोकतांत्रिक शब्द जोड़ा गया।

इसका अर्थ यह हुआ कि जिस लोकतांत्रिक प्रणाली को हमारे देश ने अपनाया है उसमें प्रत्येक ग्रामीण सक्रिय भाग ले। आम नागरिक शासन प्रक्रिया में अपना योगदान अनुभव करे। रिपोर्ट के अनुसार सामुदायिक विकास व राष्ट्रीय विस्तार सेवा का विकास इसलिए नहीं हो पाया कि इनमें जन-सहभागिता के तत्व का अभाव था। जनता स्थानीय कार्यकलापों में तभी रुचि लेगी जब उनके लिए प्रतिनिधि सभाएं गठित हों।

विकेन्द्रीकरण के अर्थ को स्पष्ट करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार को कुछ कार्यों व अधिकारों को निचले स्तरों पर हस्तांतरित करना चाहिए तथा निचले स्तरों पर पर्याप्त वित्तीय साधन भी उपलब्ध् कराने चाहिए।

 

अधिकार एवं शक्तियां

रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि इन निकायों को अपना कार्य करने के लिए समुचित वित्तीय साधन मिलना आवश्यक है। इसके लिए एक कानून बनाकर आय के कुछ साधन इन्हें सौंप देने चाहिए। इन संस्थाओं द्वारा जिन कार्यों के संपादन की समिति ने सिफारिशें की थींवे हैं कृषिपशुपालनसहकारितालघु सिंचाई कार्यग्रामोद्योगप्राथमिक शिक्षास्थानीय संचारसफाईस्वास्थ्य व चिकित्सा तथा स्थानीय सुविधाए आदि।

 

संरचनाः

गठन के बारे में समिति के सुझाव थे कि ग्राम पंचायत स्तर पर चुने गए सदस्यों में दो महिलाएंएक सदस्य अनुसूचि जाति से व एक अनुसचित जनजाति से होने चाहिए। ग्राम पंचायत का चुनाव ग्राम सभा द्वारा किया जाए। मध्य स्तर पर सदस्यों का चुनाव ग्राम पंचायत का चुनाव ग्राम सभा द्वारा किया जाए। मध्य स्तर पर सदस्यों का चुनाव ग्राम पंचायतें प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से करें। चुने हुए सदस्यों में दो महिलाएं हो जो बाल और महिला विकास के कार्य में दिलचस्पी रखती हों। इसमें अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को आरक्षण देने की सिफारिश भी की गई थी। पंचायत समितियों के प्रधानों के अलावा सांसद व राज्य विधान सभा के सदस्य भी जिला परिषद के सदस्य होंगे। जिला परिषद् समितियों व सरकार के बीच कड़ी का कम करें।

 

अशोक मेहता समिति

अशोक मेहता की अध्यक्षता में पंचायती राज समिति का गठन 12 दिसम्बर 1977 को निम्न उद्देश्यों को लेकर हुआ थाः

1. सर्वाधिक विस्तृत

1. राज्यां तथा केन्द्र शासित क्षेत्रों में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के संबंध में कमियों व त्रुटियों का पता लगाने के लिए वर्तमान स्थिति का और जिला स्तर से ग्राम स्तर तक पंचायती राज संस्थाओं की कार्यप्रणाली का पुनरीक्षण कराना। मुख्य रूप से संसाध्न जुटाने व कमजोर वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर ग्रामीण विकास की योजनाएं बनाने के संबंध में सुझाव देना।

चुनाव प्रणाली सहितपंचायती राज संस्थाओं की गठित पद्धति की जांच करना तथा पंचायती राज व्यवस्था के कार्य निष्पादन पर उनके प्रभावों का मूल्यांकन करना।

भविष्य में समेकित ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका आदि के संबंध में सुझाव देना।

पंचायती राज संस्थाओं को अपनी भावी भूमिका निभाने में समर्थ बनाने के उद्देश्य से उनका पुनर्गठन एवं कमियों व त्रुटियों को दूर करने के उपाय सुझाना।

पंचायती राज संस्थाओंसरकारी प्रशासन तंत्र तथा ग्रामीण विकास में संलग्न सहकारी तथा स्वयंसेवी संस्थाओं के बीच सहयोगपूर्ण संबंधो के बारे में सिफारिशें देना।

पंचायती राज संस्थाओं को सौंपी जानेवाली जिम्मेदारियों को निभाने के लिए पर्याप्त धन सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक वित्त संबंधी मामलों सहितअन्य सिफारिशें देना।

समिति ने अगस्त, 1978 में अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी थी। समिति ने सिफारिशें देने से पूर्व तत्कालीन पंचायत व्यवस्था का मूल्यांकन किया। समिति ने पंचायतों के विकास को तीन चरणों में विभाजित कियाः    

क. उभार ;1959-64

ख. गतिरोध ;1965-69

ग. ह्रास ;1969-77

      

समिति की सिफारिशें    

1. पंचायतें दो स्तरों पर गठित होनी चाहिएः जिला स्तर पर जिला परिषद् तथा ब्लॉक स्तर पर मंडल पंचायत (इस समिति ने ग्राम स्तर पर पंचायत गठित करने की सिफारिश नहीं की थी)। औसतन 15000 से 20000 की जनसंख्या पर एक मंडल पंचायत होनी चाहिए। ग्रामों को ग्राम समितियों के माध्यम से मंडल पंचायत में शामिल किया जाना चाहिए। चुनावों में अनुसूचित जाति व जनजाति को उनकी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। पंचायतों का कार्यकाल 4 वर्ष का होना चाहिए।

मंडल व जिला स्तर दो ऐसी महिलाओं को भीजिन्होंने जिला परिषद् के चुनावों में अधिकतम मत प्राप्त किए होंपरिषद् का सदस्य बनाया जाएगा। जिला परिषद् विभिन्न समितियों के द्वारा कार्य करेगी। ग्राम सभा का गठन होगा जिसकी वर्ष में दो सभाएं होंगी। पंचायती राज चुनावों में राजनीतिक दलों की भागीदारी होगी।

2. पंचायतों की कार्य-सूची विकास की गतिशीलता के आधार पर निर्धारित होनी चाहिए। विकेन्द्रीकरण राजनैतिक खैरात या प्रशासनिक रियायत नहीं होनी चाहिए। प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों को सबंधित स्थानीय स्तरों परपर्याप्त अधि्कारों और कार्यां का विकेन्द्रीकरण करना चाहिए तथा उसी अनुपात में वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। जिला परिषद् राज्य के सभी विकेन्द्रीकरण कार्यक्रम संभाले तथा जिला स्तर पर योजना बनाए। पंचायतों को विकास कार्य सौंपना तब तक अपूर्ण रहेगा जब तक कि पंचायतों को स्वयं निर्णय लेने और अपनी निजी आवश्यकताओं के अनुसार कार्यक्रम बनाने का अधिकार नहीं दिया जाता।

3. पंचायतों को केवल जनता के विचार जानने की सभा न बनाकरउन्हें उपलब्ध् संसाधनो से स्वयं अपने लिए योजना तैयार करने में सक्षम बनाया जाना चाहिए। जिला परिषद् जिले की योजना बनाए। जिला स्तर पर जिला योजना बनाने के लिए समिति का गठन किया जाना चाहिए।

4. पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गां को लाभान्वित करने के लिए कार्यक्रम तैयार करने होंगे।  

5. राज्य सरकार के कार्यों का विकेन्द्रीकरण करने के साथ-साथ सभी जिला स्तर के अध्किरियों को जिला परिषदों तथा उसके नीचे के स्तरों के अधीन रखना होगा। श्रेणी-1 और श्रेणी-2 का राजपत्रित कर्मचारी वर्ग राज्य सरकार के कैडर में ही रहेजबकि श्रेणी-3 तथा श्रेणी-4 का कर्मचारी वर्ग पूरी तरह से पंचायती राज सरकारों को हस्तांतरित कर दिया जाए। जिला परिषद के कर्मचारी वर्ग की नियुक्ति स्वतंत्र राज्य तथा जिला स्तर के बोर्डों द्वारा की जानी चाहिए। पंचायतों के लिए अलग से एक मंत्री होना चाहिए।

6. राज्य सरकार द्वारा बजट हस्तांतरित करने के अलावापंचायतों को स्वयं भी अपने वित्तीय साध्न जुटाने होंगेतभी वे सही ढंग से अपने दायित्वों को निभा सकती हैं। वसूल किए गए ऐच्छिक करों के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए। भू-राजस्व पर उपकरजन्मदर पर उपकरस्टांपशुल्क पर अधिमूल्यमनोरंजन करप्रदर्शन कर पंचायतों को सौंप देना चाहिए। इनमें अधिक प्रतिशत मंडल पंचायतों का होना चाहिए। बाजारहाटमंडीमेले आदि राजस्व के महत्वपूर्ण साधन हैं। ये सब पंचायतों को सौंपे जाने चाहिए। पंचायती राज वित्त निगम स्थापित किए जाने चाहिए।

7. मानव संसाधन विकास उद्देश्य से सरकारी कर्मचारियों और निर्वाचित प्रतिनिध्यिो के अलग-अलग व सयुंक्त कार्यक्रम चलाने चाहिए। प्रशिक्षण कार्यक्रमों का मूल्यांकन होना चाहिए। महिला मंडलों के गठन को प्रोत्साहन देना चाहिए। पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाने तथा जन-समर्थन जुटाने के लिए स्वैच्छिक संस्थाओं को प्रोत्साहन देना चाहिए।

8. सहकारी समितियों व पंचायतों राज संस्थाओं में समन्वय का संबंध होना चाहिए। मंडल पंचायतों का आधरभूत ढांचा मजबूत करने के लिए ग्रामीण बैंकों की स्थापना की जानी चाहिए। जिला परिषद व मंडल पंचायत का नगरपालिकाओं से संबंध स्थापित होना चाहिए।

 

जी.के.वी.राव समिति 

योजना आयोग द्वारा इस समिति का गठन 25 मार्च, 1985 को ग्रामीण क्षेत्र में विकास व गरीबी उन्मूलन से संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा करने के लिए किया गया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट दिसम्बर, 1985 में प्रस्तुत की। इस समिति ने पंचायतों की आर्थिक स्थितिउनके चुनाव और कार्यकलापों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राज्य सरकारें लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया के प्रति उदासीन रही हैं। अधिकांश राज्या में पंचायतें शक्ति व अधिकार तथा संसाधनो के अभाव में निष्प्रभावी होती जा रही हैं। समिति ने पंचायतों को मजबूत करने के लिए निम्न सुझाव दिए- जा रही हैं।

समिति ने पंचायतों को मजबूत करने के लिए निम्न सुझाव दिए-

1. योजनाएं तैयार करनेनिर्णय लेने व उसे लागू करने का कार्य पंचायतों को सौंपा जाए क्योंकि वे जनता के अधिक निकट हैं।

2. समिति के मत था कि जिला स्तर पर विशेष रूप से विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए। जिला परिषद के एक सदस्य को 30,000 से 40,000 की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। बैंकोंशहरी स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के प्रतिनिधिविधान सभाओं के सदस्य व सांसद भी इसमें सहयोजित होने चाहिए। इसका कार्यकाल आठ वर्ष का होना चाहिए। कार्यकाल समाप्त होते ही तुरंत चुनाव कराने चाहिए विशेष परिस्थिति में यदि उनका कार्यकाल बढ़ाया भी जाए तो वह छह महीने से अधिकं नहीं होना चाहिए।

3. जिल स्तर के सभी कार्यकाल स्पष्ट रूप से जिला परिषद के अधीन होने चाहिए। कृषिपशुपालनसहकारितालघुसिंचाईप्राथमिक व प्रौढ़ शिक्षालोक स्वास्थ्यग्रामीण जल आपूर्तिजिले की सड़केंलघु व ग्रामोद्योगअनुसूचित जाति व अनूसूचित जनजाति का कल्याणसमाज व महिला कल्याण और सामाजिक वनपालन जिला परिषदों को दे देने चाहिए।

4. कार्य संपादन के लिए जिला परिषदों की विभिन्न समितियां गठित की जानी चाहिए। 

5. राज्य सरकारों द्वारा दी जानी जानेवाली धनराशि को निर्धरित करने का काम वित्त आयोग को दिया जाना चाहिएजिसकी नियुक्ति हर पांच साल के बाद होनी चाहिए। जिला स्तर पर वित्त पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध् होता रहेइसके लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में राज्य विकास परिषद् का गठन होना चाहिए। राज्य सरकार में सभी मंत्री व जिला परिषदों के अध्यक्ष इस समिति के सदस्य होने चाहिए।

6. जिला स्तर से नीचे पंचायत समिति या मंडल पंचायतें भी गठित की जानी चाहिए और इनका गठन व संरचना जिला परिषद् जैसी ही होनी चाहिए। प्रत्येक गांव में ग्राम सभा होयह बात भी समिति ने कही। पंचायत समिति या ग्राम व मंडल पंचायत स्तर पर बच्चोंमहिलाओं व प्रौढ़ों के कल्याण के लिए उपसमिति का गठन होना चाहिए जिसके सदस्य मुख्यतया महिलाएं होनी चाहिए। जो विभिन्न समाजसेवी संस्थाएंग्रामों में कार्य कर रही हैंपंचायतों को विभिन्न समितियों के माध्यम से उनकी सेवाएं लेनी चाहिए।

7. राव समिति ने पंचायतों को लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की संस्थाओंजिनकी सिफारिश बलवंत राय मेहता समिति ने की थीको कारगर बनाने के लिए ठोस सुझाव सरकार को दिए थे।

 

एल.एम.सिंघवी समिति 

राव समिति की रिपोर्ट के एक वर्ष बाद एल.एम.सिंघवी की अध्यक्षता में पंचायती राज संबंधी प्रपत्र तैयार करने के लिए समिति गठित की गई जिसने अपनी रिपोर्ट 27 नवम्बर 1986 को प्रस्तुत की। इस समिति ने पंचायतों का अवलोकन व मूल्यांकन करने के बाद पंचायती राज व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए विभिन्न सिफारिशें कीं। इनमें प्रमुख सिफारिश पंचायती राज प्रणाली के कुछ पहलुओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाना था ताकि इन्हें राजनीतिज्ञों व नौकरशाही के हस्तक्षेप से दूर रखा जा सके। न्याय पंचायतों के गठन की सिफारिश भी की गई। समिति ने पहली बार पंचायतों से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक का मसौदा तैयार किया।

इस समिति का दृष्टिकोण था कि पंचायतों को एक ऐसा समग्र संस्थागत ढांचे के रूप में संगठित किया जाना चाहिए जिसका आधार नीचे से ऊपर की ओर उन्मुख लोकतांत्रिक विकेन्दीकरण हो। इन स्वशासन की संस्थाओं के माध्यम से विकेन्द्रीकृत शासनयोजना तथा विकास की प्रक्रिया में जनता की सहभागिता इनका उद्देश्य था।

 

 

पी.के. थुंगन समिति

समितियों के इस क्रम में सिंघवी समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखकर 1988 में पी.के. थुंगन की अध्यक्षता में संसदीय सलाहकार समिति की एक उपसमिति ने पंचायती राज को सशक्त बनाने के लिए पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की सिफारिश की। इसके उपरांत ही मई, 1989 में संविधान (64वां संसोधन) विधेयक संसद में पेश किया गया।


दोस्तों हमें कमेन्ट के ज़रिए बतायें कि आपको हमारा आर्टिकल कैसा लगायदि अच्छा लगा हो तो आप इसे सोशल मीडिया पर अवश्य शेयर करें यदि इससे सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो नीचे कमेन्ट करके हमसे पूंछ सकते है धन्यबाद !