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पंचायती राज प्रणाली : चुनौतियां व समाधान


पंचायती राज की चुनौतियां

 

कार्यात्मक चुनौतियां

ग्राम सभा के कार्यः संविधान संशोधन के अनुच्छेद 243क के अनुसार ग्राम सभा अपने स्तर पर ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों की निर्वाह कर सकेगी जो राज्य के विधानमंडल द्वारा विधि् द्वारा उपबंधित किए जाएं। स्पष्ट है कि ग्राम सभा को कितने कार्य व शक्ति प्रदान की जाए यह राज्य विधनमंडल की इच्छा पर छोड़ दिया गया है।


पंजाबतमिलनाडुमध्य प्रदेश व केरल राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों ने ग्राम सभा को मात्रा बातचीत करने की संस्था मात्र बताया है क्योंकि इन राज्यों में ग्राम विकास से संबंधित कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में सहायता प्रदान करना और विकास कार्यकलाप चलानाविभिन्न गरीबी हटाओं कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों को चुननाएकता और सौहार्द बनाना तथा ग्राम पंचायत द्वारा पिछले वर्ष का लेखा-जोखाआने वाले वर्ष के भावी कार्यक्रम आदि को इस सभा के सामने मात्र रखने व अनुमोदित करने का अधिकार इस सभा को दिया गया है। हांमध्य प्रदेश राज्य ने तो इस सभा को चुने गए प्रतिनिधि् अर्थात पंच व सरपंच को वापस बुलाने का अधिकार भी प्रदान किया है। लेकिन अधिकतर राज्यों ने इसे कोई विशेष अधिकार व शक्तियां प्रदान नहीं की हैं। अधिकतर राज्यों ने इसे सुझाव प्रदान करने की संस्था मात्रा रखा है। इसके द्वारा प्रस्तावित सुझावों को मानना या न मानना ग्राम पंचायत की इच्छा पर निर्भर करता है।

ग्राम सभा संपूर्ण पंचायती राज व्यवस्था का दिल व दिमाग है। यह संस्था जिला पंचायत से ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियां को चुनने के अलावा ग्राम स्तर पर समाज के सभी वर्गों को ग्राम पंचायत के कार्यों व लाभों में भागीदार होने का अवसर प्रदान करती है।

लेकिन पंचायत उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम, 1996 ने ग्राम सभा की शक्तियों व अधिकारों को स्वयं अधिनियम में ही उचित तरह से परिभाषित करने का प्रयास किया है। यह अधिनियम हिमाचल प्रदेशराजस्थानगुजरातमध्यप्रदेशमहाराष्ट्रआन्ध्रप्रदेशव उड़ीसाझारखण्ड व छत्तीसगढ़ राज्यों में लागू है। इस अधिनियम में ग्राम सभा की शक्तियों को परिभाषित किया गया है। लेकिन फिर भी कुछ कार्य जैसे भूमि अधिग्रहणगौण जल इकाइयों की योजना का प्रबंधन आदि के लिए इस अधिनियम में ही कुछ स्थानों पर ग्राम सभाओं’ और पंचायतों’ के लिए लिखा है। दूसरे शब्दों मेंग्राम सभा व पंचायत दोनों संस्थाए इन कार्यों को कर सकती हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि राज्य विधनमंडलों ;जिनको इस अधिनियम को ध्यान में रखकर राज्य के लिए अधिनियम बनाने थे को स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिल सका। परिणाम स्वरूप अधिकार व शक्ति के संबंध् में यहां भी संदिग्धता की स्थिति पैदा होती है। ये सभी ग्राम सभा के सामने कार्यात्मक चुनौतियां हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि अब राज्यों ने अपने पंचायत अधिनियमों में ग्राम सभा का प्रावधान मात्र इसलिए किया हैक्योंकि 73वें संविधान संशोधन द्वारा इसे राज्यों के लिए जरूरी कर दिया गया था। लेकिन चूंकि संविधान संशोधन में उनकी कार्य व शक्तियां परिभाषित नहीं की गई हैंइसलिए राज्यों ने इस संस्था को कार्य व शक्तियां देने के नाम पर अंगूठा दिखा दिया।

इस प्रकार जब ग्राम सभा के पास कोई अधिकार व शक्तियां ही नहीं हैं तो कैसे इसमें आम लोगों की भागीदारी होक्योंकि वे सोचते हैं कि जब ग्राम सभा में कोई मुद्दा उठाने से लाभ ही नहीं तो ग्राम सभा की बैठक में जाने की क्या जरूरत है। गरीब कहते देखे गए हैं कि हम ग्राम सभा की बैठक के चक्कर में अपनी एक दिन की मजदूरी नहीं खोना चाहते। इसी से जुड़ी चुनौती आम जनता में इस संस्था के महत्व की जागरूकता का अभाव है। अगर ग्राम सभा यानी सभी मतदाता जागरूक हो जाएंतो सरपंच या ग्राम पंचायत की हिम्मत नहीं कि वह आम जनता के अधिकारों को अनदेखा कर सके।

 

वित्तीय चुनौतियां

राज्यों के पंचायती राज अधिनियमो में वित्त संबंधी प्रावधन : 73वें संविधन संशोधन के अनुच्छेद 243 ज के अनुसार राज्य विधानमंडल विधि् द्वारा निर्धरित प्रक्रिया व सीमाओं के भीतर शुल्कपथ-कर और शुल्क लगाने का अधिकार दे सकती है। कुछ विशेष सीमाओं और नियमों के अंदर राज्य सरकार इन्हें चुंगीशुल्कमहसूल उगाही आदि के कुछ अधिकार दे सकती है। राज्य सरकार अपनी किसी समेकित निधि से भी पंचायतों को अनुदान प्रदान कर सकती है। सरकार विभिन्न मदों की उधरी या साख के लिए धन लेनेवसूलने के लिए पंचायत के माध्यम से जमा करने व निकालने का भी अधिकार दे सकती है जिन्हें पंचायत अधिनियमों में वर्णित किया गया है। पंचायत राज अधिनियमों में दिए गर व गैर-कर प्रावधानों का अवलोकन करने से निम्न तस्वीरें सामने आती हैंः

1. अधिकतर राज्यों मेंजिनमें मुख्य हैं बिहारगुजरातहरियाणापंजाबउत्तर प्रदेशकर लगाने की अधिक शक्ति ग्राम पंचायतों को दी गई है। जबकि ग्राम पंचायतों के पास करों को लागू करने की पर्याप्त मशीनरी भी नहीं है। इसके अतिरिक्त ग्राम पंचायतें गांवों के बहुत करीब हैं व ग्राम प्रधान या सरपंच दिल से भी नहीं चाहता कि कर लगाए जाएं क्योंकि ऐसा करने से वे लोगों के बीच अप्रिय नहीं बनना चाहते। आन्ध्र प्रदेशअसम गोवाहिमाचल प्रदेशमध्यप्रदेशउड़ीसा व तमिलनाडु में जिला स्तर पर स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट केई कर नहीं है। इसके अतिरिक्त प्रायः सभी जगह कर लगाना या न लगाना सरकार की इच्छा पर निर्भर है। अतः स्थानीय स्तर पर कर लगाने न लगाने की शक्ति पंचायतों के हाथ में न होकर राज्य सरकार के हाथ में है।

2. जिला परिषद व अचंल पंचायतमध्य स्तर असम मेंजिला परिषद व पंचायत समितिमध्य स्तर बिहार मेंजिला पंचायत व ग्राम पंचायत गोवा मेंजिला पंचायत व पंचायत समिति हिमाचल प्रदेश मेंजिला पंचायत व ब्लॉक पंचायतमध्य स्तर पर केरल मेंपंचायत समितिमहाराष्ट्र मेंग्राम पंचायत उड़ीसा मेंजिला पंचायत व ग्राम पंचायत सिक्किम मेंजिला पंचायत तमिलनाडु मेंपंचायत के तीनों स्तरों पर त्रिपुरा मेंराज्य व पंचायतों के बीच वित्तीय साधनो के बंटवारे का प्रावधान नहीं है।

3. सभी राज्यों में पंचायतों के तीनों स्तरों को राज्य स्तर से अनुदान देने का प्रावधान है। लेकिन यहां पर कर्नाटक व महाराष्ट्र के अनुदान से संबंधित प्रावधन का जिक्र करना आवश्यक है। कर्नाटक में प्रत्येक ग्राम पंचायत को राज्य सरकार से प्रतिवर्ष 2 लाख रुपये का अनुदान देने का प्रावधान है। यह अनुदान ग्रामीण क्षेत्रा में बिजली के रखरखावपानी की उपलब्धतास्वच्छता व अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए है। इस तरह का प्रावधान अन्य किसी राज्य में नहीं है। महाराष्ट्र में जिला स्तर पर कुल अनुदान का 50 प्रतिशत भाग जिला को देने का प्रावधान है। लेकिन ऐसे गिने चुने उदाहरण हैं।

4. हरियाणाकेरलपंजाब व पश्चिम बंगाल ने पंचायतों द्वारा विकास कार्यों के लिए अपने स्तर पर ऋण लेने का भी प्रावधान किया है।

5. पंचायती राज अधिनियमों में राज्य सरकार द्वारा लगाए गए सभी करों की हिस्सेदारी का प्रावधान नहीं किया गया हैजो विकेन्द्रीकरण के विपरीत है। चूंकि 73वें संविधन संशोधन में कौन-कौन से करों की हिस्स्सेदारी राज्य सरकार व पंचायतों के मध्य होगी इसका जिक्र नहीं किया गया है। इससे अर्थ निकलता है कि राज्य सरकार द्वारा लगाए सभी करों का हिस्सा पंचायतों के साथ बांटना है। अधिकतर राज्यों ने कर हिस्सेदारी का प्रावधान मात्र भूमि राजस्व कर में किया है जिसकी राशि कुल राज्य की कर आय की बहुत कम है। राज्य सरकारों को बिक्री कर की हिस्सेदारी पंचायतों के साथ करनी चाहिए थीक्योंकि यह राज्य सरकार के पास अधिक आयवाला कर है।

 

प्रशासनिक चुनौतियां

पंचायतों पर राज्य सरकार एवं नौकरशाही का नियंत्रणः- राज्य पंचायती राज्य अधिनियमों में पंचायतों का निरीक्षण करनेपंचायतों को बर्खास्त करनेपंचायतों के प्रस्तावों को खारिज करनेपंचायतों को निर्देश देनेपंचायत प्रतिनिधियां को बर्खास्त करने से संबंध्ति विभिन्न प्रावधान किए गए हैं। वही नहीं राज्य सरकार के हाथ में अंतिम हथियार पंचायतों को 6 महीनों के लिए बर्खास्त करने का भी है। सिक्किम राज्य तो एक कदम आगे है क्योंकि वहां पर तो पंचायतों को 1 वर्ष तक बर्खास्त करने का प्रावधान है। वैसे अधिनियमों में अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान करने का प्रावधान है। लेकिन यह पर्याप्त सुरक्षा कवच नहीं है। यहां पर कुछ प्रदेशों के उदाहरण देना उचित है प्रतीत होता है। असम व कर्नाटक में आयुक्त को सरपंच को हटाने व बर्खास्त करने का अधिकार है। गोवाहरियाणाव पंजाब में निदेशक व पंचायती राज को यह अधिकार प्राप्त है। अरुणाचल प्रदेशबिहारकेरल व मणिपुर में सरकार द्वारा निर्धरित प्राधिकरण द्वारा सरपंचों को हटाने या बर्खास्त करने का अधिकार है। महाराष्ट्र में स्टेडिंग’ समिति व राजस्थान में जिला परिषद के मुख्य प्रशासनिक अध्किरियों को सरपंच को उसके पद से हटाने व बर्खास्त करने का अधिकार है।

आन्ध्र प्रदेश में राज्य सरकार आयुक्त और जिला कलेक्टर को पंचायतों के तीनों स्तरों पर पंचायती राज अधिनियम की धारा 246, 247, 250 व 259 में नियंत्रण की शक्ति प्रदान की गई है।

हरियाणा पंचायती राज अधिनियम की धारा 29 के अनुसार चपरासीसिपाहीचौकीदारसिंचाई विभाग के पैयरोल आदि के विरुद्ध पंचायतों को मात्र शिकायत करने का अधिकार है। धरा 29 में साफ तौर से लिखा है कि इससे यह अर्थ नहीं लगा लेना चाहिए कि ग्राम पंचायत को किसी कर्मचारी या ऐसे किसी अध्किरी के विरूद्ध कोई अनुशासनिक कार्रवाई या कुछ कर सकने का अधिकार प्राप्त है।

मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम में भी राज्य सरकार का पंचायतों पर पूर्ण नियंत्रण है। सरकार पंचायत के किसी भी काम की जांच-पड़ताल कर सकती है। उसके किसी आदेश को निलंबित कर सकती हैउसे आदेश दे सकती है या उसे भंग कर सकती है। उसके मामलों की जांच करा सकती है और अगर चाहे तो पंचायतों की शक्तियों को अपने किसी अधिकारी को प्रत्यायोजित कर सकती है।

उड़ीसा में अगर राज्य सरकार की राय में किसी पंचायत समिति के अध्यक्षउपाध्यक्ष या किसी सदस्य के कानून के प्रावधानों का उल्लंघन या खुद में निहित शक्तियों का दुरुपयोग किया है तो वह उसे उसके पद से हटा सकती है। राज्य सरकार की नजर में यदि पंचायत समिति अपने कर्त्तव्यों के निर्वाह में सक्षम नहीं है तो वह निर्धरित ढंग से एक अधिसूचना जारी करके ऐसी समिति को भंग कर एक समिति का गठन कर सकती है।

उपर्युक्त प्रावधानों से यह निष्कर्ष निकलता है कि राज्यों के पंचायती राज अधिनियमों में निर्वाचित प्रतिनिधियो के सामूहिक विवेक में विश्वास की बजाय व्यक्ति के राय को अधिक महत्व दिया है। दूसरेवैसे तो पंचायती राज अधिनियम चूक करने वाली संस्थाओं को अपने आचरण के बारे में सफाई देने का अवसर प्रदान करता हैपर वह पंचायती राज संस्थाओं की अक्षमता के बारे में समुचित कार्यवाही की व्यवस्था नहीं करता हैपर वह पंचायती राज संस्थाओं की अक्षमता के बारे में समूचित कार्यवाही की व्यवस्था नहीं करता जो कि पंचायतों को सही मायनों में स्वशासन की संस्था बनाने ;जैसा की 73वें संविधान संशोधन में दिया है वंचित करता है।

 

पंचायत व उनके कार्मिक 

पंचायतों को संविधान की धरा 243-छ की 11वीं अनुसूची के द्वारा 29 विषय हस्तांतरित किए गए हैं। इन 29 विषयों में कृषिसामाजिक वानिकीलघु व कुटीर उद्योगपेयजलसड़कग्रामीण विद्युतीकरणगरीबी निवारण कार्यक्रमशिक्षास्वास्थ्य और सफाईपरिवार कल्याण आदि विषय शामिल हैं। इसके अतिरिक्त आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय के लिए योजना बनाने व लागू करने का कार्य भी पंचायतों का सौंपा गया है। इस प्रकार पंचायतों के तीनों स्तरों अर्थात ग्राम पंचायतपंचायत समिति व जिला पंचायत को अपने स्तर पर आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय की योजना बनाने व क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी दी गई है। इस कार्य के लिए योजना के उद्देश्य व व्यूह रचना तैयार करनाआंकड़े एकत्रा करनापंचायत स्तर का खाका तैयार करनायोजनाओं का मूल्यांकन करनायोजना तैयार करनायोजनाओं को अन्य विभागीय योजनाओं से जोड़ना आदि कार्य शामिल हैं। इन कार्यकलापों से अनुमान लगाया जा सकता है कि पंचायतों को कितने तकनीकी व गैर-तकनीकी कार्मिकों की आवश्यकता है।

एक नजर राज्यों के पंचायती राज अधिनियमों पर पता चलता है कि पंचायती राज अधिनियमों का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में सुधारित प्रशासनलोगों की भागीदारी द्वारा आर्थिक विकास सुनिश्चित करना है न कि स्वायत शासन की संस्थाएं स्थापित करना है।

हां और कुछ राज्य जैसे पंजाबबिहार व तमिलनाडु में पंचायती राज अध्नियमों का उद्देश्य स्वायत शासन की संस्थाएं स्थापित करना है भी तो वहां अध्नियमों के प्रावधान ऐसा साबित नहीं करते। विभिन्न राज्यों में नौकरशाही को थोक में अधिकतर दिए गए हैं। वे जब चाहें जैसे चाहें पंचायतों को ध्वंस कर सकते हैं।

पंचायतों को प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करने के लिए आवश्यक है कि उनके अपने कार्मिक हों। इसके लिए जरूरी है कि उनका अपना स्टाफ राज्य सरकार के द्वारा ही नियुक्तस्थानांतरित व नियंत्रित किए जाते हैं। वैसे गुजरात व राजस्थान में पंचायतों के अपने काडर स्थापित करने का प्रावधान हैं। इसके लिए चयन बोर्ड बनाने का का प्रावधान हैजिसमें अन्य के अलावा जिला पंचायत का अध्यक्ष भी सदस्य है। इसके अतिरिक्त जिला पंचायत रोजगार चयन समिति व जिला प्राथमिक स्कूल स्टॉफ चयन समिति का प्रावधान भी अधिनियम में है। लेकिन राज्य सचिवालय ने पंचायतों द्वारा भर्ती किए गए अध्यापकों व पटवारियों का भी तबादला करना शुरू कर दिया है।

राजस्थान में जिला स्थापना समितिजिला पंचायत अध्यक्ष की अध्यक्षता में गठित करने का प्रावधान है। इस समिति का उद्देश्य ग्राम स्तर के कर्मचारीपंचायत सचिवप्राथमिक अध्यापक व लिपिकवर्गीय स्टाफ का चयन करना है। लेकिन ये प्रावधान मात्रा प्रावधान ही रह गए हैं। कर्मचारियों की भर्ती पर नियंत्राण राज्य सरकार व उसकी नौकरशाही का है। वैसे अन्य राज्यों जैसे हरियाणा पंचायती राज अधिनियम की धारा 33 ;6, पंजाब पंचायती राज अधिनियम की धारा 26, बिहार पंचायती राज अधिनियम की धारा 85 ;5, कर्नाटक पंचायती राज अधिनियम की धारा 195 ;5 में भी पंचायत काडर गठित करने का प्रावधान है लेकिन कही पर भी यह प्रभावी ढंग से क्रियान्वित नहीं हो सका। मध्य प्रदेश में भी राज्य सरकार ने जनपद पंचायत की सिफारिश पर स्कूल अध्यापकों की भर्ती का प्रावधान किया हैजो कुछ हद तक उचित प्रतीत होता है लेकिन शिक्षा कर्मी का वेतन कम होने के कारण इस व्यवस्था में प्रतिभाशाली व्यक्ति शायद ही आए।

 

सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां

सामाजिक चुनौतिया : हिन्दू शास्त्रों में लिखा है कि र्ध्मानुसार स्त्रा को बाल्यावस्था में पिता के संरक्षण मेंयुवावस्था में पति के संरक्षण में और पति का देहांत हो जाने पर पुत्रों के अधीन रहना है। नारी को जन्म लेते ही सिखा दिया जाता है कि तुम्हारा अपना कुछ भी नहीं है तुम्हारा आदर्श अपने आप को पति को समर्पित करना है। परिणाम स्वरूप नारी को हाड़-मांस के पुतले के अलावा कुछ भी नहीं समझा जाता है। इस तरह की व्यवस्था के कारण अपनी पहचान ही खो बैठती है। इसी आत्म सम्मान की भावना की कमी के कारण उसके सीखने की प्रक्रिया शिथिल हो जाती है।

पुरुष मानसिकता भी एक बड़ी चुनौती महिलाओं के सामने है। पुरुष वर्ग नहीं चाहता कि महिलाएं घर से बाहर निकलें। मध्य प्रदेश में मंदसौर जिले की ग्राम पंचायत अंबा की सरपंच मोडीबाई की उसकी पति ने इसलिए हत्या कर दी कि वह पंचायत की बैठक में जाती थीगांव की समस्याएं सुलझाती थी और विकास योजनाओं का क्रियान्वयन करती थी।

इस सामाजिक व्यवस्था के बारे में डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा था कि सामाजिक व्यवस्था संस्कृति के द्वारा समाज के सदस्यों की भावना को नियमित करती है और संस्कृति की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि उनको हटाना व्यवस्था के आधार में परिवर्तन के बिना संभव नहीं है। जाति व वर्गों में बंटे समाज में निम्न’ जातियों अनुसूचित जाति एवं जनजाति की स्थिति तो और भी दयनीय हैं। ऊंची जातियों की महिलाओं की आर्थिक स्थिति फिर भी ठीक है लेकिन गरीब परिवारों की महिलाओं के बारे में तो गरीब की जोरू सबकी भाभी’ वाली कहावत चरितार्थ होती हैक्योंकि उनका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है।

 

आर्थिक चुनौतियां 

पंचायत प्रतिनिधियों के सामने सामाजिक चुनौतियों के अलावा आर्थिक चुनौतियां भी कम गंभीर नहीं है। ये प्रतिनिधि वित्तीय साधनो के अभाव के कारण अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभाने में समर्थ नहीं हो पाते। नई आर्थिक नीतिजिसके अंतर्गत धीरे-धीरे जलजंगल व जमीन पर नियंत्रण आम लोगों का कम होता जा रहा हैने कमजोर तबकों की पहले से बिगड़ी आर्थिक स्थिति पर जले पर नम छिड़कने का कार्य किया है।

महिलाओं की भूमि व संपत्ति में क्या भागीदारी है इससे पहले एक नजर ग्रामीण गरीब पर डाल ली जाए। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि कुल ग्रामीण जनसंख्या का 37.27 प्रतिशत भाग गरीबी रेखा से नीचे है। कुछ राज्यों जैसे बिहारउड़ीसा व मध्यप्रदेश में तो यह प्रतिशत क्रमशः 58.21 प्रतिशत, 49.72 प्रतिशत व 40.64 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति व जनजाति में य समस्या और भी गंभीर है। अनुसूचित जाति गरीबी रेखा से नीचे रह रही जनसंख्या का प्रतिशत 48.11 है। कुछ राज्य जैसे बिहार 70.66 प्रतिशतउत्तर प्रदेश ;58.55 प्रतिशत तथा महाराष्ट्र 51.64 प्रतिशत में इन वर्गों में गरीबी राष्ट्रीय स्तर से भी अधिक है। अनुसूचित जनजाति वर्ग में गरीबी रेखा से नीचे रह रही जनसंख्या का प्रतिशत 51.94 है। कुछ राज्य जैसे बिहार ;69.75 प्रतिशतहिमाचल प्रदेश 69.94 प्रतिशतउड़ीसा 71.28 प्रतिशत व पश्चिम बंगाल ;61.95 प्रतिशत में गरीबी का स्तर राष्ट्रीय स्तर से भी अधिक है। उपर्युक्त आंकड़ों से आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि गरीबी रेखा से नीचे रह रहे परिवारों से अधिक अनुसूचित जाति एवं जनजाति के परिवार हैं। इन गरीब परिवारों में भी गरीबी की ज्यादा मार महिलाओं पर पड़ती है।

आठवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार देश के लगभग 30 प्रतिशत परिवारों की मुखिया महिलाएं हैं जिनमें अधि् कतर गरीबी रेखा से नीचे बसर कर रही हैं। इन महिलाओं के पास कोई संपत्ति जैसे भूमि नहीं हैन ही इन महिला कामगारों की लगभग 90 प्रतिशत जनसंख्या असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत है जहां उन्हें पुरुषों की अपेक्षा कम मजदूरी दी जाती है। स्थिति यह है कि रात-दिन कार्य करने के पश्चात अर्थशास्त्रियों के मापदंडों के अनुसार भारत की आधी जनसंख्या कुल राष्ट्रीय आय का केवल 19 प्रतिशत हिस्सा ही कमा पाती है।

प्रशासनिक एकेडमीमसूरी ने ऐसे सरकारी नियम कानूनों का जिक्र किया हैजो महिलाओं व गरीब तबकों के विरूद्ध जाता है। उनमें भूमि व संपत्ति से संबंध्ति कुछ प्रावधानों का जिक्र यहां किया गया है। उत्तर-पश्चिम व भारत के कुछ राज्यों जैसे हरियाणापंजाबजम्मू व कश्मीरहिमाचल प्रदेशदिल्ली व उत्तर्रप्रदेश में कृषिगत भूमि पुरुष पैतृक वंशज को ही मिलती है। विध्वा या लड़कियों को जमीन पुरुष उत्तराधिकारी  न होन पर ही मिलती है। इसके अतिरिक्तउत्तर प्रदेश में जमींदारी खातमा अध्नियम की धारा 171 के अनुसार लड़की को पैतृक संपत्ति की हिस्सेदारी से रोकती है। भूस्वामी की मृत्यु के बाद भूमि लडकों में हस्तांतरित होगी। विवाहित लड़की तभी भूमि में हिस्सेदारी की पात्र हैयदि उस भूमि के अन्य हिस्सेदार नहीं हैं।

उपर्युक्त उदाहरणों के अलावा उड़ीसा में एक प्राइवेट कंपनी को ‘‘नाम टिंबर फोरेस्ट प्रोजेक्ट’’ में वन उत्पदों का अधिकार 10 वर्ष के लिए दे दिया गया है। जबकि इन पर अधिकार ग्रामीण गरीबों का होना चाहिए थाजिनके लिए ये उत्पाद भोजनचाराफल व दवाइयों की प्राप्ति के साथ-साथ उनके जीवन निर्वाह का साधन था। यही नहींउड़ीसा सरकार ने निर्णय किया है कि बांस’ को पेपर कंपनी को दे दिया जाए। यह कदम 1988 की वन नीति के खिलाफ हैजिसके अनुसार वन में रहने वालों को इसके लिए प्राथमिकता दी गई थी। आश्चर्य की बात है कि यहां गरीब वनवासी वनों से चोरी करके अपने घरेलू ईंधन व अन्य जरूरतों की मांग की पूर्ति करते हैं जबकि कंपनी को सबसाइड’ दर से बांस मिलता है।

वीणा अग्रवाल ने एक दस्तावेज तैयार किया है जिसके अनुसानर महिलाओं को भूमिध्र होने का अध्किर प्राप्त नहीं है और जहां-जहां यह अधिकार था भी उसकी बहुत हद तक समाप्त कर दिया गया है। वीणा अग्रवाल ने 145 भूमिध्र जातियों का अध्ययन कर पाया है कि 131 जातियों में महिलाएं पैतृक संपत्ति की उत्तराधिकारी नहीं हैं। सरकारी आंकड़ा बताता है कि सरकार ने काफी जमीन भूमि परिसीमन अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त की है जिसको भूमिहीनों में वितरित किया गया है। सरकारी मार्गदर्शिका बताती है

कि जब लाभार्थी को जमीन का पट्टा दिया जाए तो वह उसके व उसकी पत्नी के नाम संयुक्त रूप से होना चाहिए। लेकिन प्रो. एस.एन. मिश्रा द्वारा किया गया अध्ययन बताता है कि व्यवहार में ऐसा नहीं किया गया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कैसे महिला व कमजोर वर्ग आर्थिक रूप से सशक्त होंगे। और यदि ये वर्ग आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होंगे तो कैसे अपनी भूमिका प्रभावी सदस्य व अध्यक्ष के रूप में पंचायतों में निभा पाएंगे।

 

आर्थिक सुधार व वंचित वर्ग

सुधर का अर्थ होता है कि जनता के जीवन में खुशहाली लाना। लेकिन 1991 से जो आर्थिक सुधार की प्रक्रिया हुई है उसके अंतर्गत ढांचागत समायोजन कार्यक्रमनिजीकरण व भू-मंडलीकरण आते हैं इसने महिलाओं की स्थिति को सुधरने की बजाय बिगाड़ा है। अध्ययन बताते हैं कि पिछले 5 सालों में महिलाओं का कार्य करने का अनुपात बढ़ा है। जिसका मुख्य कारण और कुछ नहीं महिलाओं का सस्ता श्रम है। अध्ययन बताते है कि स्थायी नौकरियों में 25 प्रतिशत तथा अस्थायी कार्यों के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 25 प्रतिशत कम पारिश्रमिक मिलता है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि दो-तिहाई खेतिहर श्रमिक महिलाएं गरीबी रेखा से नीचे रह रही हैं। 24-25 अप्रैल, 1998 को समाजिक विज्ञान संस्थाननई दिल्ली ने महिला राजनैतिक सशक्तीकरण दिवस मनाया था। इसमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की अर्थशास्त्रा श्रीमती उतसा पटनायक ने नई आर्थिक नीति का गरीब परिवारों पर प्रभाव’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस नीति के अंतर्गत स्थानीय संसाधन जैसे जलजंगल व जमीन पर वर्चस्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां का बढ़ता जा रहा हैजिसका सीध संबंध् पंचायत व गांव के कमजोर तबके से जुड़ा है। नई आर्थिक नीति के अंतर्गत स्वास्थ्य व अन्य सामाजिक कार्यों में विनियोग 1991 जब से यह नीति लागू हुई थी उस समय की तुलना में कम हुआ हैजिसके कारण गरीबी का स्तर बढ़ा है। इस नीति के कारण पंजाब व हरियाणा जैसे विकसित प्रदेशों में राज्यों के कुल परिव्यय में ग्रामीण परिव्यय घटने के कारण गरीबी का स्तर बढ़ा है।

विशाल थापर ने हिन्दुस्तान टाईम्स 16 जनवरी 2000 के अपने एक लेख में आर्थिक सुधार व गरीबी पर प्रकाश डालते हुई निम्न तथ्य प्रस्तुत किए थेः

1. आर्थिक सुधार लागू होने से अब तक ग्रामीण गरीबी 3.42 प्रतिशत बढ़ी है। एक दूसरे अनुमान के अनुसार अस्सी के दशक में गरीबी में 10 प्रतिशत की गिरावट आई थी लेकिन 1989-90 के बाद गरीबी में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

2. राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन जनवरी-जून 1998 द्वारा किए गए अध्ययन के अनुमान बताते हैं कि गांव में प्रति व्यक्ति व्यय 382 रुपये है जबकि शहरों में यह 684 रुपए है। गावं में कुल व्यय का 61 प्रतिशत खाद्य पर व्यय होता है। खाद्य मदों की बढ़ती कीमतों से गरीब परिवार और गरीब हो गए हैं।

3. आर्थिक सुधार लागू होने के बाद ग्रामीण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों पर व्यय कम हुआ है उससे भी वंचित वर्ग की स्थिति और बिगड़ी है।

उपर्युक्त विश्लेषण स्पष्ट रूप से बताता है कि ग्रामीण समाज के कमजोर तबकों का आर्थिक सशक्तीकरण पक्ष जो पहले ही कमजोर थाभूमि सुधार प्रभावी रूप से लागू न होने और फिर नई आर्थिक नीति के आ जाने के कारण पहले से कमजोर वर्ग और कमजोर हो गया। ऐसी स्थिति में जब ये वर्ग अपनी दो वक्त की रोटी में उलझे रहते हैं तो भला वे पंचायतों के लिए कैसे समय निकाल पाएंगे। ऐसी स्थिति में तो वे यही कर सकते है कि बताओ अंगूठा कहां लगाना है। आइए एक नजर पंचायतों में चुनकर आई महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर डालते हैं।

लेखक ने हरियाणा प्रदेश के 75 प्रतिशत पंचायत प्रतिनिध्यिं का सर्वेक्षण किया था इनमें से 92 प्रतिशत पंचायत समिति की सदस्या, 85 प्रतिशत सरपंच व 97 प्रतिशत पंच के नाम न जमीन थी और न कोई संपत्ति। कुल महिला प्रतिनिध्यिं में से 36 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे बसर कर रही थीं।

प्रो. सुशीला कौशिक ने भी हरियाणा की 100 चुनी प्रतिनिधियां का सर्वेक्षण किया और पाया कि 26 प्रतिशत परिवारों के पास जमीन नहीं थी। 23 परिवारों के पास कोई भी दुधरू पशु नहीं थे। लगभग 50 प्रतिशत परिवारों के पास दुधरू पशुघर व कृषि जमीन के अलावा अन्य कोई परिसंपत्ति नहीं थी। संपूर्ण प्रतिदर्श में से 19 महिलाएं अनुसूचित जाति व 1 अनुसूचित जनजाति से थी जो बहुत ही गरीब परिवारों से थीं।

श्रीमती निर्मला बुच ने मध्य प्रदेश में महिला प्रतिनिधियां का सर्वेक्षण किया और पाया कि 56.82 प्रतिशत महिलाएं गरीबी रेखा से नीचे रह रहे परिवारों से संबंधित थीं। महिला प्रतिनिधियां के इस गरीबी स्तर से अनुमान लगाया जा सकता है कि वे अपने घरों को देखेंगी या गांव को। फिर इन गरीब महिलाओं की सुनेगा कौन?

1995 में संपन्न कर्नाटक पंचायत चुनाव में चुने प्रतिनिधियां का अध्ययन बताता है कि पंचायती राज के तीनों स्तरों को एक साथ रखकर पाते हैं कि 33.1 प्रतिशत महिला अध्यक्ष व उपाध्यक्षों की वार्षिक आय 5,000 रुपये से कम थी तथा 33.33 प्रतिशत महिलाओं की वार्षिक आय 5,000 से 10,000 रुपये के बीच में थी विदित है कि जन परिवारों की वार्षिक आय 11000 रुपए से नीचे है वे गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं। इस प्रकार 66.4 प्रतिशत से अधिक महिला अध्यक्ष व उपाध्यक्ष गरीबी रेखा से नीचे रह रही हैं।

गरीब तबके के व्यक्ति कहते सुने गए हैं किह हम ग्राम सभा की बैठक में जाने के चक्कर में अपनी एक दिन की दिहाड़ी नहीं खोना चाहते। क्योंकि उन्हें पता है कि बैठक में जाने से कुछ मिलना नहीं है। लेखक का स्वयं का अनुभव है कि प्रशिक्षण शिविर में ग्रामीण समाज के कमजोर वर्ग जब अपनी समस्याएं बताते थे उनमें एक अहम समस्या गरीबी की होती थी। क्योंकि पंचायत बैठकों पर घर से बाहर जाने के लिए उनके अपनी दिहाड़ी खोनी पड़ती थी।

 

निष्कर्ष 

उपर्युक्त अध्ययन से स्पष्ट है कि पंचायत प्रतिनिधियां के सामने अनेक सामाजिक व आर्थिक चुनौतियां हैं। महिलाओं के सामने पंचायत पदाधिकारियों और पुरुष सहयोगियों का असहयोगपूर्ण और संवदेनशील रवैया तथा घर और बाहर दोनों जगह एक साथ काम करने का बोझ भी चुनौती बन गया है। परिवार यदि गरीब है तो उसमें सबसे ज्यादा नुकसान महिला ही उठाती है। इन वर्गों की बिगड़ती सामाजिक स्थिति पर जले पर नमक छिड़कने का कार्य अशिक्षा व नई आर्थिक नीति ने किया है।

 


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