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भारत की संस्कृति | Bhartiya Sanskrati

 

भारत की संस्कृति


भारत उपमहाद्वीप की क्षेत्रीय सांस्कृतिक सीमाओं और क्षेत्रों की स्थिरता और ऐतिहासिक स्थायित्व को प्रदर्शित करता हुआ मानचित्र भारत की संस्कृति कई चीजों को मिला-जुलाकर बनती है जिसमें भारत का लम्बा इतिहासविलक्षण भूगोल और सिन्धु घाटी की सभ्यता के दौरान बनी और आगे चलकर वैदिक युग में विकसित हुईबौद्ध धर्म एवं स्वर्ण युग की शुरुआत और उसके अस्तगमन के साथ फली-फूली अपनी खुद की प्राचीन विरासत शामिल हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों को रिवाज परम्पराओं और विचारों का भी इसमें समावेश है। पिछली पाँच सहस्त्राब्दियों से अधिक समय से भारत के रीति-रिवाजभाषाएँप्रथाएँ और पंरपराएँ इसके एक दूसरे से परस्पर संबंधों में महान विविधताओं का एक अद्वितीय उदाहरण देती है। भारत कई धार्मिक प्रणालियों  जैसे कि हिन्दू धर्मजैन धर्म और सिख धर्म जैसे धर्मों का जनक है। इस मिश्रण से भारत में उत्पन्न हुए विभिन्न और परम्पराओं ने विश्व के अलग-अलग हिस्सों को भी काफी प्रभावित किया है।

 

भारतीय संस्कृति का विकास

भारत एक विशाल देश है। उत्तर में हिमालय की श्रेणियों और पूर्वदक्षिण और पश्चिम में समुद्र के होने के कारण यह शेष विश्व से अलग रहा है। ये भौगोलिक विशेषताएं भारत को शेष विश्व से अलग एक सुस्पष्ट इकाई बनाती हैंपरंतु ये विशेषताएँ शेष विश्व से भारत के सम्पर्क में कभी बाधक नहीं रही हैं। भारत के वर्तमान लोग हजारों वर्षों से यहाँ आने वाले विविध संस्कृति एवं परिवेश से आए लोगों की संतान है। वास्तव में भारतीय जनता यहाँ आकर बसने वाली सभी नस्लों और उनसे बनी मिश्रित नस्लों की ही वंशज है। ऐतिहासिक काल में अनेक नृजातीय समूहों के लोग यहाँ आए और यहीं का होकर रह गए। इनमें इंडो-यूरोपीय भाषाएं बोलने वाले इंडो-आर्यनईरानीयूनानीकुषाणशकहूणअरबतुर्कअफ्रीका और मंगोल शामिल हैं। इस प्रकार भारत विभिन्न नस्लों’ और नृजातीय समूहों’ का संगम रहा है।

प्रागैतिहासिक काल से ही विभिन्न जाति के लोगों का भारत में आगमन उनकी जीवन-प्रणाली और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को निर्धारित करने वाला प्रमुख कारण रहा है। भारतीय इतिहास के लगभग हर दौर में इसके प्रभाव को स्पष्ट देखा जा सकता है। दूसरी संस्कृतियों और सभ्यताओं के लोग यहाँ अपनी-अपनी परम्पराएं लेकर आते रहे और इन परंपराओं का पहले से मौजूद परंपराओं से मेल और समन्वय होता रहा है। उदाहरण के लिए यदि हम भाषा की बात करें तो उर्दू’ और खड़ी बोली’ पूरी तरह से समन्वित संस्कृति का ही परिणाम हैं वर्तमान में तेजी से उभर रही हिंग्लिश’ भी भारतीय समन्वयवादी संस्कृति को दर्शाती है। इसी प्रकार अमीर खुसरो द्वारा आविष्कारित तबला’ तथा सितार’ जो कि क्रमशः मृदंग तथा वीणा का अपभ्रंश माना जाता हैभी साझी संस्कृत का ही उदाहरण है। वर्तमान में तेजी से लोकप्रिय हो रहे फ्यूजन संगीत’ जिसका प्रणेता शुभा मुद्गल तथा कलोनिमन कजन को माना जाता हैभी साझी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। मंदिर निर्माण की बेसर शैली गांधार कलाताजमहलफतेहपुर सीकरीविक्टोरिया टर्मिनसराष्ट्रपति भवन आदि के निर्माण में प्रयुक्त शैलियाँ कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे भारतीय की साझी संस्कृति प्रतिबिम्बित होती है। सूफी तथा भक्ति संत भी अनन्य रूप से साझी संस्कृति की ही उपज है। दरअसलदेश के ऐतिहासिक विकास के कारण विभिन्न भागों के लोग यहाँ आए हैं और एक साझी संस्कृति का निर्माण हुआ है। साथ ही देश के हर भाग की एक अलग और खास पहचान भी विकसित हुई है। यही कारण है कि भारत के सांस्कृतिक विकास को प्रायः विविधता में एकता’ की संज्ञा दी जाती है। इस साझी संस्कृति के विकास में देश के सभी क्षेत्रों और लोगों का योगदान रहा है। देश का कोई भी एक भाग या क्षेत्र भारतीय संस्कृति का एकमात्र स्रोत या केन्द्र नहीं रहा। विभिन्न कालों में विभिन्न क्षेत्रों की अग्रणी भूमिका रही है और वहाँ से उत्पन्न प्रवृत्तियों ने उस काल में देश के दूसरे भागों के विकास को प्रभावित किया है। इतिहास के विभिन्न कालों में उत्तर और दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्राय राज्यों ने इस संस्कृति के विकास में अहम भूमिका अदा की है। भारत के लंबे इतिहास के दौरान उसकी संस्कृति आंतरिक कारणों और दूसरी संस्कृतियों के सम्पर्क के कारण लगातार परिवर्तित और विकसित होती रही है। वास्तव में जब हम भारत के सांस्कृतिक विकास के इतिहास का अवलोकन करते हैं तो पाते हैं कि  मतभेदों के बावजूद भारतवासियों के विचारोंभावनाओं और रहन-सहन के तरीकों में एक बुनियादी एकता हैजो राजनीतिक नक्षत्रों के बदलने से घटती-बढ़ती तो है किन्तु कभी समाप्त नहीं होती।

अनेक बार भीतरी और बाहरी अलगाववादी शक्तियों ने इस एकता को भंग करने का भय व भ्रम उत्पन्न कियाकिंतु एक रहने की भावनाओं ने विरोधी प्रवृत्तियों और आंदोलनों को एक समन्वयात्मक संस्कृति में समाहित कर लिया। वस्तुतः भारत की संस्कृति एक समन्वित संस्कृति हैजिसमें विभिन्न प्रकार के तत्व पाए जाते हैं।

 

भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रचार-प्रसार

 

जिस प्रकार दूसरी संस्कृतियों और सभ्यताओं के लोग अपनी-अपनी परंपराएं लेकर समय-समय पर भारत आते रहे और भारतीय परंपराओं से उनकी परंपराओं का समन्वय होता रहाठीक उसी तरह भारत के लोग भी दुनिया के दूसरे भागों में जाते रहे और अपनी परंपराओं का वहाँ की परंपराओं से समन्वय करते हुए भारतीय संस्कृति को समृद्ध  किया। पाश्चात्य विश्व के साथ भारत का सम्पर्क मुख्यतः व्यापार-परक थाकिंतु उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण-पूर्व के देशों में भारतीय संस्कृति का पूर्ण प्रचार हुआ। एशिया के जिन देशों में भारतीय संस्कृति का विस्तार हुआउनमें तिब्बतचीनकम्बोडियावियतनामबर्मा ;म्यांमार स्याम ;थाइलैण्डमलायासुमात्राजावाबोर्नियो आदि शामिल हैं।

 

मध्य एशिया

चीनभारत तथा ईरान के बीच स्थित प्रदेश को मध्य एशिया अथवा चीनी तुर्किस्तान कहा जाता है जिसका विस्तार काशगर से लेकर चीन की सीमा तक इसके अंतर्गत काशगरयारकन्दखोतानशानशानतुर्फानकूचीकरसहर आदि शामिल किये जाते हैं। चौथी शताब्दी तक इस सम्पूर्ण क्षेत्र पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव स्थापित हो चुका था। मौर्य शासक अशोक के धर्म-प्रचारकों ने भारतीय संस्कृति को मध्य एशिया में फैलाया। गुप्तकाल के प्रारंभ तक बौद्ध  धर्म मध्य एशिया के सभी लोगों में पूरी तरह प्रतिष्ठित हो गया था। पफाह्यान के विवरण से पता चलता है कि वहाँ के निवासी भारतीय भाषा का अध्ययन करते थे। संस्कृत में लिखी हुई विभिन्न बौद्ध रचनाओं की प्रतिलिपियाँ भी प्राप्त होती हैं। धर्म के साथ ही साथ भारतीय चिकित्सा एवं कला का भी मध्य एशिया में प्रचार हुआ। भारतीय कला की गन्धार शैली का प्रभाव यहाँ की मूर्तियोंस्तूपों आदि पर स्पष्टतः परिलक्षित होता है।

 

तिब्बत

 

तिब्बत का प्राचीन इतिहास अन्धकार पूर्ण है। सर्वप्रथम सातवीं शताब्दी में इसके विषय में संसार को कुछ ज्ञान हुआ। इस समय तिब्बत में स्रांग सनगम्पो नाम का एक अत्यन्त शक्तिशाली राजा हुआ जिसने मध्य एशिया पर आक्रमण कर वहाँ अपना अधिकार स्थापित किया। उसके समय में तिब्बत में बौद्ध  धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। सनगम्पो ने भारतीय बौद्ध ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद कराकर उसे लोकप्रिय बनाया। बौद्ध  धर्म को देशव्यापी बनाने के उद्देश्य से उसने नालन्दा एवं ओदन्तपुरी विश्वविद्यालयों में क्रमशः शांतरक्षित एवं पद्म संभव को तिब्बत आमंत्रित किया। यहाँ बौद्ध मत की वज्रयान शाखा का प्रचार-प्रसार हुआ। यद्यपि प्राचीन तिब्बती समाज में भी तंत्र-मंत्र प्रथायें थींलेकिन बौद्ध  धर्माचार्यों द्वारा ले जायी गयी तंत्र परम्परा स्थानीय परम्परा की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुई। धर्म के साथ-साथ कुछ अन्य क्षेत्रों में भी भारतीय प्रभाव दिखाई देता है। तिब्बती लिपि का आविष्कार नालन्दा विश्वविद्यालय में हुआ। तिब्बत में विद्यमान विशाल मंदिर एवं मूर्तियाँ स्पष्टतः भारतीय हैं। वस्तुतः तिब्बती संस्कृति के विविध पक्षों पर भारतीय प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है।

 

चीन

 

प्राचीन काल से ही भारतीयों को चीन के विषय में ज्ञान था। एक चीनी ग्रंथ से पता चलता है कि चीन का हुआंग-चे कांची के साथ समुद्री मार्ग से व्यापार होता था। कालिदास ने भी चीनी रेशमी वस्त्र’ ;चीनांशुक का उल्लेख किया है। चीनी परम्पराओं के अनुसार भारत के बौद्ध प्रचारक चीन में 217 ईसा पूर्व ही पहुँच गये थे। बौद्ध  धर्म की सरलता एवं व्यावहारिकता से प्रभावित  अनेक यात्रियों ने बौद्ध ग्रंथों की प्रतियाँ लेने तथा पवित्र बौद्ध स्थानों के दर्शनार्थ भारत की यात्रा की। इनमें फाहियानव्हेनसांग तथा इत्सिंग के नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध  हैं। बौद्ध सम्पर्क से चीन में मूर्तिपूजामंदिर-निर्माणभवन-निर्माणभिक्षुजीवनपुरोहितवाद आदि का प्रारंभ हुआ। कला के क्षेत्र में भारतीय गंधारकला का चीनी कला पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। अजन्ता के गुहा चित्रों के समान तुल-हुआंग में गुहा-चित्र प्राप्त होते हैं। भारतीय संस्कृति के विविध तत्वों का चीनी संस्कृति पर प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है।

 

 

दक्षिण-पूर्व एशिया

 

दक्षिण-पूर्व एशिया के अंतर्गत कम्बोडियाचम्पाबर्मास्याममलय प्रायद्वीप जिन्हें सामूहिक रूप से हिन्द-चीन कहा जाता हैतथा पूर्वी द्वीप समूह के सुमात्राजावाबोर्नियो और बाली के द्वीप सम्मिलित हैं। प्राचीन भारतवासी सम्पूर्ण क्षेत्र को सुवर्णभूमि’ तथा सुवर्णं-द्वीप’ नाम से जानते थेजो गरम मसालेस्वर्णबहुमूल्य धातुओंखनिजों के लिए प्रसिद्ध था। अर्थशास्त्रकथासरित्सागरपुराण आदि ग्रंथ भी सुवर्णभूमि का उल्लेख करते हैं। विभिन्न साहित्यिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत तथा सुदूर-पूर्व के बीच सम्पर्क का मुख्य प्रेरक व्यापार ही था। कालांतर में यह व्यापार-वाणिज्य सम्बन्ध राजनीतिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्क में परिणत हो गया।

 

हिन्द-चीन

 

भारतीय संस्कृति का विस्तार हिन्द-चीन क्षेत्र में भी हुआ। हिन्द-चीन के राज्यों में सर्वप्राचीन राज्य कम्बुज (कम्बोडिया) में स्थित था। चीनी साहित्य में इसे फनन’ (फनान) कहा गया है जिसकी स्थापना प्रथम-शताब्दी में कौण्डिन्य नामक ब्राह्मण ने की थी। कौण्डिन्य के वंशजों ने 100 वर्षों तक शासन किया। फनन के हिन्दू राजाओं ने यहाँ भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया। सातवीं शताब्दी आते-आते कम्बुज (कम्बोडिया)जो पहले फनन के अधीन थास्वतंत्रा हिन्दू-राज्य बन गया तथा फनन को अपने अधीन कर लिया। इस समय से कम्बुज हिन्द-चीन का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य बन गया। 11वीं 12वीं शताब्दी के प्रारंभ में सूर्यवर्मन प्रथम ने कम्बुज में एक नये राजवंश की स्थापना की जिसके वंशज के शासक सूर्यवर्मन द्वितीय ने अंकोरवाट में विष्णु का प्रख्यात मंदिर बनवायाजो भारतीय संस्कृति का जीवन्त चित्र प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार चम्पाबर्मास्याममलायासुमात्राजावाबार्नियो आदि में भी भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ जिसका प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।

 


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