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डलहौजी की व्यपगत नीति, डलहौजी की हड़प नीति पर प्रकाश डालिए | Dalhauji Ki Hadap niti

 

लॉर्ड डलहौजी का व्यपगत सिद्धांत या लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति

डलहौजी ने साम्राज्य विस्तार के लिए इसे नया हथियार बनाया। उसने गोद लेने की प्रथा पर पाबंदी लगाई तथा संतानहीन शासकों के राज्यों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का प्रयत्न किया। कंपनी के लिए व्यपगत से अभिप्राय था कि पैतृक वारिस न होने की स्थिति में कंपनी अपने अधीनस्थ तथा पराधिन क्षेत्रों को साम्राज्य में मिला सकती है। डलहौजी ने भारतीय राज्यों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया


1. पहलावे राज्य थे जिनके निर्माण में ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष योगदान था तथा ऐसे राज्यों के शासकों के गोद लेने पर पूर्णतः पाबंदी लगा दी गई थी।

2. दूसराराज्यों के शासकों के लिए यह व्यवस्था की गई कि वे गोद लेने के पहले सरकार की सहमति प्राप्त करें। ऐसे राज्य अंग्रेजी सरकार के अधीनस्थ राज्य थे।

3. तीसरी श्रेणी में ऐसे देशी रिशसतों को रखा गया थाजिनके शासकों को गोद लेने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी।

 

व्यपगत सिद्धांत का क्रियान्वयन

सतारा ;1848 ई.जैतपुर ;1849 ई.संभलपुर ;1849 ई.बघाट ;1850 ई.उदयपुर ;1852 ई.झांसी ;1852 ई.तथा नागपुर ;1854 ई. ।

 

व्यपगत सिद्धांत की आलोचना

डलहौजी ने अपनी इस नीति से देशी प्रजा में असंतोष की भावना भर दीजिससे ब्रिटिश विरोधी तत्वों को बढ़ावा मिला। डलहौजी के वापस जाते ही 1857 ई. का संग्राम फुट पड़ा एवं 1858 ई. में ब्रिटिश सरकार ने देशी रियासतों के प्रति अधीनस्थ एकीकरण की नीति अपनाई। देशी रियासतों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करना ही अन्यायपूर्ण था क्योंकि राज्यों का निर्माण अंग्रेजों ने नहीं किया था और न ही वे वैधानिक दृष्टि से भारत की सर्वोच्च सत्ता थे। सैद्धानतिक रूप से सभी भारतीय राज्य मुगल सम्राट के अधीन थे तथा मुगल सम्राट ही भारत का सम्राट था। गोद लेने की प्रथा में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि हिन्दुओं में गोद लेने की प्रथा धार्मिक व कानूनी रूप से मान्य थी।

 

लॉर्ड डलहौजी एवं कुशासन की अवधारणा

1856 में अवध का विलय करने के लिए लॉर्ड डलहौजी द्वारा एक दूसरे प्रकार की अवधारणा का विकास किया गया और यह अवधारणा थी कुशासन की अवधारणा। डलहौजी ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया की अवध का नवाब वाजिदअली शाह अपनी प्रजा को अच्छा शासन नहीं दे सका है। इसलिए इसे अपनी प्रजा पर शासन करने का कोई अधिकार नहीं हैं। इसी को आधार बनाकर कंपनी ने अवध क्षेत्रा का विलय कर लिया यह सही है कि कंपनी के द्वारा साम्राज्यवादी विस्तार पर बल ब्रिटिश औपनिवेशिक हित में किया गया था परन्तु भारत में शासन करने वाले विभिन्न प्रशासक बार-बार अपने उद्देश्यों को छुपाने का प्रयास कर रहे थे। उदाहरण के लिये विलियम बेटिंक से लेकर डलहौजी तक भारत में काम करने वाले विभिन्न प्रशासकों ने अपनी साम्राज्यवादी विस्तार की नीति लोक सुधार में अवधारणा डालने का काम किया और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि विभिन्न भू-भागों पर विजय उनके हितों में किया जा रहा है। विलय का वास्तविक उद्देश्य यह प्रस्तुत किया कि प्रजा को निरंकुश शासन से मुक्त कर विकास के रास्ते पर ले जाना।



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