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धर्म एवं धर्म दर्शन | Dharm Evum Dharm Darshan

 

धर्म एवं दर्शन

धर्म’ भारतीय संस्कृति का वह महत्वपूर्ण अंश है। जिसका महत्व आदि काल से अब तक क्षीण नहीं हुआ है। अपने धर्म पर सदैव से ही कोई प्रश्नचिन्ह सहन न कर पाने वाले भारतीयों ने भी अन्य धर्मों का स्वागत किया और पूरे सम्मान के साथ उन्हें अपने बीच स्थान दिया। यही कारण है कि भारत अनेक धर्मो का केन्द्र रहा है। भारत की सुरक्षित छत्र-छाया में अनेक धर्म जन्मे तथा फूले-फूले और भारत के अभिन्न अंग या यूं कहें भारतीय संस्कृति के प्राण बन गए। जहां एक ओर धर्म आंतरिक अनुभूतियों के महत्व को प्रकट करना है कि वहीं दर्शन व्यक्ति की आध्यात्मिक चेतना का परिचायक है। जब कोई व्यक्ति अपनी आत्मा को बाह्य गतिविधियों से परे रखता है और आंतरिक रूप से एकीकृत करता है तो उसे अद्भूत और पवित्र अनुभव प्राप्त होते है।


धर्म

धृ’ धातु से व्युत्पन्न धर्म’ अपने मूल अर्थ में धारण करना होता है। धर्म’ शब्द की व्युत्पत्ति के पूर्व ही इस शब्द में निहित भावना ;धारण करना भारतीयों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। धर्म’ के महत्व को प्रदर्शित करने वाले अनेक ग्रंथ है। जिनमें बारंबार इसकी वृहद् व्याख्या की गई है। महाभारत में धर्म को प्राणियों का रक्षक बताया गया है। धर्म की शास्त्रकारों ने अलग-अलग तरह से व्याख्या की हैपरंतु सभी की व्याख्या का मूल बिंदु यही है कि धर्म से तात्पर्य उस आचरण की संहिता से है जिसके माध्यम से मनुष्य नियमित होता हुआ विकास करता है। और अंतोगत्वा मोक्ष प्राप्त करता है। प्राचीन काल से ही भारतीय जीवन का हर पक्ष धर्म से प्रभावित रहा है। वस्तुतः अति प्राचीन काल से ही भारत में धर्म को एक प्रेरक तत्व के रूप में स्वीकार किया गया। यही कारण है कि धार्मिक सहिष्णुता का जो आदर्श हमें यहाँ देखने को मिलता है वह विश्व की किसी अन्य संस्कृति में दुर्लभ है। कालक्रम में अनेक मतों का आविर्भाव हुआजो धर्म के रूप में प्रतिष्ठित हुए और भारत के अभिन्न अंग बन गये। ऐसे धर्मों में बौद्धजैनसिक्ख आदि शामिल किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ धर्म बाहर से आये और भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग बन गये। मुसलमानईसाईबहाईजरथ्रुस्टपारसी सभी यहाँ आकर यहीं के हो गये।

 

 

प्रमुख भारतीय धर्मों का संक्षिप्त विवरण

 

हिन्दू धर्म

हिन्दू धर्म की गणना विश्व के प्राचीन धर्मों में की जाती है। सामान्यतः इस धर्म की व्याख्या करना अत्यंत दुष्कर है क्योंकि अन्य धर्मों की तरह न तो हिन्दूधर्म का कोई एक संस्थापक है और न ही कोई एक धर्मग्रंथ।

प्राचीन ईरानियों सिंधु-नदी के पूर्व क्षेत्र को हिंद’ कहा और इस क्षेत्र में रहने वाले हिन्दू’ कहलाएं। कालांतर में हिन्दू शब्द धर्म और संस्कृति से जुड़ गया और उस समय प्रचलित धर्म को हिन्दू धर्म’ की संज्ञा दी गयी। अतः अन्य धर्मो की तरह हिन्दु धर्म की स्थापना धर्म’ के रूप में नहीं की गई बल्कि यह स्वंय ही धर्म के रूप में विकसित हुआ।

वास्तव में हड़प्पा संस्कृति के धार्मिक विश्वासों और आर्यों से पहले भारत में रहने वाले लोगों के धार्मिक विश्वासों का समन्वय होने पर विविध प्रकार के धार्मिक विश्वासों तथा प्रथाओं का विकास हुआ जो सब मिलाकर हिन्दू धर्म का अंग माने जाते हैं। विविध सिद्धांतमतों और कर्मकाण्डों के कारण हिन्दू धर्म में अनेक सम्प्रदायों का जन्म हुआ। कालक्रम में इन संप्रदायों ने पूजा की अपनी पद्धतियाँ विकसित कीं पंरतु प्रत्येक संप्रदाय अपनी व्यवस्था का अनुसरण करते हुए भी दूसरों के विचारों के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण रखता हैं जो भारतीयों का धर्म के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है।

प्रारंभिक वैदिक धर्म में मूर्तियों या मंदिरों का कोई स्थान नहीं था। मनुष्य प्रकृति के विभिन्न रूपों को ही पूजता था। कालक्रम में अनेक कर्मकाण्ड एवं रीतियाँ इस धर्म से जुड़ीं और अदृश्य शक्ति की पूजाप्रतीकों एवं मूर्तियों के रूप में होने लगी। आज भी हिन्दू धर्म में अनेकानेक देवताओं का स्थान हैतथा विभिन्न विधानों द्वारा उनकी पूजा की जाती है। लेकिन हिन्दू धर्म का बुनियादी रूप कर्म और सांसारिक सिद्धांतों से जुड़ा है।

इसी प्रकार इस धर्म के अनुयायियों के दृष्टिकोण एवं दर्शन में भी अंतर हैकोई एकेश्वरवाद में विश्वास करता है तो कोई अपनी आस्था अनेकेश्वरवाद में प्रकट करता है। किसी के आराध्य राम हैंतो किसी के विष्णुकृष्णशिव आदि। यद्यपि हिन्दू धर्म में दर्शनपरम्परा व इष्ट को लेकर मतविभिन्नता हैकिंतु यह विभिन्नता इतनी अधिक नहीं है कि लोगों के हिंदुत्व को झुठला सके और सभी स्वंय को हिन्दू मानते हैं।

 

संक्षेप में हिंदू धर्म की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

ईश्वर की सत्ता में असीम आस्था।

विभिन्न देवी-देवताओं एवं उनके प्रतीकों की उपासना।

प्रकृति की उपासना में विश्वास।

अवतारवाद की अवधारणा में विश्वास।

आत्मा की अमरता में विश्वास।

वेदो में असीम आस्था।

कर्म में विश्वास।

पुनर्जन्म में विश्वास।

मूर्ति-पूजा में विश्वास।

जीवन का प्रमुख लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति

 

पूर्व वैदिककालिन धर्म

हर समुदाय को अपने धर्म का आलोकन अपने ही परिवेश में मिलता है। वर्षा का होनासूर्य और चंद्र का उदयनदी-पर्वत आदि का अस्तित्वये सब बातें वैदिक लोगों के लिए पहेली जैसी थीं। अतः उन लोगों ने इन प्राकृतिक शक्तियों को अपने मन में दैहिक रूप देकर इन्हे प्राणियों के रूप में देखा और इनमें मानव और पशु के गुण आरोपित किए। ऐसे बहुत-से देवताओं के दर्शन हमें ऋग्वेद में मिलते हैंजिसमें इन देवताओं की स्तुति में विभिन्न ऋषियों के रचे सूक्त भरे पड़े हैं। ऋग्वेद में सबसे अधिक प्रतापी देवताइंद्र हैजिसे पुरंदर अर्थात् किले या आवास को तोड़ने वाला कहा गया है। इंद्र आर्यों के युद्ध नेता के रूप में चित्रित हैजिसने असुरों से लड़ने में आर्य सैनिकों का नेतृत्व किया और उन्हें विजय दिलाई। इंद्र पर 250 सूक्त हैं। वह बादल का देवता माना गया है जो वर्षा देता है। अग्नि का दूसरा स्थान है। उस पर 200 सूक्त हैं। आदिम अवस्था के लोगों के अग्नि की भूमिका बड़े महत्व की रहीक्योंकि इससे वे जंगलों को जलानाखाना पकाना आदि काम लेते थे। अग्नि की उपासना न कवेल भारत मेंअपितु ईरान में भी होती थी। वैदिक काल में अग्नि ने देवताओं और मानवों के बीच मध्यस्थ का काम किया है। समझा जाता था कि अग्नि में डाली जाने वाली आहुतियाँ धुआँ बनकर आकाश में जाती हैं और अंततः देवताओं को मिल जाती हैं। तीसरा स्थान वरुण का है जो जल या समुद्र का देवता माना गया है। उसे ट्टतु अर्थात् प्राकृतिक संतुलन का रक्षक कहा गया हैऔर समझा जाता था कि जगत में जो भी घटना होती है वह उसी की इच्छा का परिणाम है। सोम वनस्पतियों का अधिपति माना गया है और एक मादक रस का नाम उसी के नाम पर पड़ा है। मरुत आधी के देवताँ हैं। इस प्रकार हमें इसमें ऐसे बहुत सारे देवताओं के उल्लेख मिलते हैं जो किसी न किसी रूप में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के प्रतिरूप हैं और साथ ही मानवोचित व्यवहार भी करते हैं।

देवताओं में कुछ देवियाँ भी हैंजैसे अदिति और उषाजो प्रभात समय के प्रतिरूप हैं। किंतु ऋग्वेद काल में देवियों की प्रमुखता नहीं थी। उस काल के पितृतंत्रात्मक समाज में देवों का बोलबाला देवियों से कहीं अधिक था।

देवाताओं की उपासना की मुख्य रीति थी स्तुतिपाठ करना और यज्ञ बलि चढ़ाना अर्पितकरना। ऋग्वैदिक काल में स्तुतिपाठ पर अधिक जोर था। स्तुतिपाठ सामूहिक भी होता था और अलग-अलग भी। इंद्र और अग्नि समस्त जन द्वारा दी गई बलि ग्रहण करने के लिए आहूत होते थे। उन दिनों शब्द में किसी जादुई असर का होना उतना नहीं माना जाता थाजितना उत्तर वैदिक काल में माना जाने लगा। ऋग्वेदिक काल के लोग अपने देवताओं से संततिपशुअन्नधान्यआरोग्य आदि पाने की कामना से उनकी उपासना करते थे।

 

उत्तर वैदिक कालिन धर्म


उत्तर वैदिक काल में उत्तरी दोआब ब्राह्मणों के प्रभाव में आर्य संस्कृति का केंद्र स्थल बन गया। लगता है सारा उत्तर वैदिक साहित्य कुरु-पंचालों के इसी प्रदेश में विकसित हुआ। यज्ञ इस संस्कृति का मूल था और यज्ञ के साथ-साथ अनेकानेक अनुष्ठान और मंत्र विधियाँ प्रचलित हुई।

देवताओं में दो सबसे बड़े देवता इंद्र और अग्नि अब उतने प्रमुख नहीं रहे। इनकी जगह उत्तर वैदिक देवमंडल में सृजन के देवता प्रजापति को सर्वोच्च स्थान मिला। ऋग्वैदिक काल के कुछ अन्य गौण देवता भी प्रमुख हुए। पशुओं के देवता रुद्र ने उत्तर वैदिक काल में महत्ता पाई। जो लोग ऋग्वैदिक काल के अपने   खानबदोशी जीवन को छोड़ स्थानीय रूप से बस गए थेवे लोग विष्णु को अपना पालक और रक्षक मानने लगे। इसके अलावादेवताओं के प्रतीक के रूप में कुछ वस्तुओं की भी पूजा प्रचलित हुई। उत्तर वैदिक काल मे मूर्तिपूजा के आरंभ का कुछ आभास मिलने लगता है। चूंकि समाज ब्राह्मणराजन्यवैश्य और शूद्र इन चार वर्णों में विभक्त मिलने लगता है। चूंकि समाज ब्राह्मणराजन्यवैश्य और शूद्र इन चार वर्णों में विभक्त हो गया थाइसलिए कुछ वर्णों के अपने देवता भी हो गए। पूषन् जो पशुओं की रक्षा करने वाला माना जाता हैशूद्रों का देवता हो गयाहालांकि ऋग्वेद युग में पशुपालन सारी आर्य जाति का मुख्य व्यवसाय था। देवताओं की आराधना के जो भौतिक उद्देश्य पूर्व में थेवे ही इस काल में भी रहे। लेकिन आराधन की रीति में महान अंतर आया। स्तुतिपाठ पहले की तरह चलते रहेलेकिन वे देवताओं को प्रसन्न करने की प्रमुख रीति नहीं रहेप्रत्युत यज्ञ करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया और यज्ञ के सार्वजनिक तथा घरेलू दोनों रूप प्रचलित हुए। सार्वजनिक यज्ञ राजा अपनी सारी प्रजा के साथ करता था और प्रजा में अक्सर एक ही कबीले के लोग होते। निजी यज्ञ अलग-अलग व्यक्ति अपने-अपने घर में करते थेक्योंकि इस काल  मैं वैदिक लोग स्थायी निवासी में रहते थे और उनके नियमित कुटुंब होते थे। घर का प्रत्येक व्यक्ति अग्नि में आहुति देता था और ऐसा प्रत्येक कर्म अनुष्ठान या यज्ञ का रूप धारण कर लेता था। यज्ञ में बड़े पैमाने पर पशुबलि दी जाती थीजिससे खास तौर से पशुधन का ह्रास होता गया। अतिथि गोधन कहलाते थेक्योंकि उन्हें गोमांस खिलाया जाता है।

यज्ञों में कर्म के साथ मंत्र पढ़े जाते थे। यज्ञकर्ताओं को इन मंत्रों का उच्चारण बड़ी सतर्कता से करना होता था। यज्ञ करनेवाला यजमान कहलाता था और यज्ञ का फल बहुत कुछ इस पर निर्भर करता था कि यज्ञ में मंत्रों का उच्चारण कितनी शुद्धता से किया गया। वैदिक आर्यों में प्रचलित बहुत-से अनुष्ठान हिंद-यूरोपीय भाषाभाषियों के कर्मकांड से मिलते हैंलेकिन कुछ हिंद-भूमि में विकसित प्रतीत होते हैं।

वैदिक काल के अंतिम दौर मेंपुरोहितों के प्रभुत्व के विरुद्ध तथा यज्ञ और कर्मकांडों के विरुद्ध प्रबल प्रतिक्रिया प्रारंभ हुई। यह प्रतिक्रिया पंचालों और विदेह के राज्य में विशेषकर हुईजहां 600 ई. पू. के आसपास उपनिषदों का संकलन हुआ था। इन दार्शनिक ग्रंथों ने कर्मकांड की निंदा की और सम्यक् विश्वास एवं ज्ञान पर बल दिया। उपनिषदों ने आत्मा को पहचानने और आत्मा तथा ब्रह्म के संबंध को सही रूप में समझने पर बल दिया। तात्कालीन शक्तिशाली राजाओं की तरह ब्रह्म की परिकल्पना परम सत्ता के रूप में की गई। पंचाल और विदेह के कई क्षत्रिय राजाओं ने भी इस प्रकार के चिंतन को अपनाया और ब्राह्म धर्म में सुधार लाने के लिए उपयुक्त वातावरण बनाया। उनके उपदेशों से स्थायित्व और अखंडता की भावना को बल मिला। आत्मा-अपरिवर्तीअविनाशी और अमर है इस बात पर बल देने से उस स्थायित्व की भावना को बल मिलाजिसकी अत्यधिक आवश्यकता क्षत्रिय शासकों के अधीन उदीयमान राजसत्ता को थी। आत्मा और परमात्मा (ब्रह्म) के बीच संबंध की भावना से प्रजा में राजा के प्रति भक्ति जगी।

समाजशास्त्र में संप्रदाय शब्द का प्रयोग एक विशेष प्रकार के धार्मिक समृद्ध के लिए किया जाता है। यह इस अर्थ में धर्म से अलग है कि धर्म के भीतर रहकर भी यह उसका विरोधी है। संप्रदाय से तात्पर्य स्वैच्छिक संघ है। जिसके अनुसार अनुयायी सांसारिक जीवन से अलग-थलग रहते हैं। धर्म की सदस्यता जहां धर्म आधारित है वहीं संप्रदाय में शामिल होना एक स्वैच्छिक कार्य है। संप्रदायों का निर्माण किसी विशेष धार्मिक परंपरा के भीतर होता हैं जीवन को देखने का इसका दृष्टिकोण पारिवारिक आर्थिक राजनीतिक और बौदधिक दृष्टि से अलग-अलग होता है।

इनमें से किसी भी या इनमें से सभी मुद्दों पर अलग दृष्टिकोण या मत रखने से अक्सर एक संप्रदाय का निर्माण होता है। लगभग सभी संप्रदाय कम से कम अपने आरंभिक चरण में प्रचलित धार्मिक परंपराओं का विरोध करते हैं। संप्रदायों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह होती है कि धीरे-धीरे वे औपचारिक धर्म का रूप लेने लगते हैं। आरंभ में हालांकि इसकी स्थापना सांसारिकता विरोध के लिए होती है परंतु  संप्रदाय समाज से तालमेल स्थापित कर लेते हैं और उससे अलग-थलग नहीं रह पाते। मूलतः संप्रदायों का निर्माण एक बंधे हुए समूह के रूप में हुआ था और कई तरीकों और अनुष्ठान से वे अपनी पहचान बनाए रखने का प्रयत्न करते रहे हैं। वे अपने संप्रदाय के भीतर ही विवाह करते हैं। सामाजिक अवसरों पर भागीदारी को भी नियंत्रित करते हैं और कहीं-कहीं तो सैनिक सेवा करने का भी प्रावधान है। इसके अतिरिक्त खान-पान के तौर-तरीकों से भी एक संप्रदाय दूसरे संप्रदाय से अपनी अलग पहचान बनाए रखने का प्रयत्न करता है।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि संप्रदायों का निर्माण अपनी धार्मिक परंपराओं का विरोध करने के लिए हुआ था। उन्होंने संसार के प्रति अपना आक्रोश प्रकट किया। यह आक्रोश कहीं उग्र रहा तो कहीं शांत। समान विचार के लोगों ने अपनी इच्छानुसार संप्रदाय बनाए और उसमें शामिल हुए। समय के साथ-साथ कई संप्रदाय धर्मों में परिवर्तित होने लगे परंतु सभी संप्रदायों के साथ ऐसा नहीं हुआ।

 

 

हिन्दू संप्रदाय


हिंदू धर्म में सबसे अधिक संप्रदाय और उपसंप्रदाय हैं हिंदुओं में शिवविष्णु और मातृदेवी जिसकी पूजा दुर्गाकाली और अन्य रूपों में की जाती हैमहत्वपूर्ण देवी देवता हैं। अधिकतर पंथों संप्रदायोंउपसंप्रदायों का उद्गम इन्हीं तीनों से हुआ है। इन पंथों में शिव और पार्वती के संप्रदाय सबसे प्राचीन है जबकि कृष्ण पंथ अपेक्षाकृत नया है।

 

वैष्णव संप्रदाय


इस संप्रदाय के लोग विष्णु को कृष्ण या राम के रूप में पूजते हैं। इसके प्रमुख संप्रदाय और उपसंप्रदाय इस प्रकार हैं। श्री संप्रदायः इस संप्रदाय की स्थापना दक्षिण भारत के भारतीय दर्शन के महान विद्वान रामानुज ने किया था। यह संप्रदाय दक्षिण भारत में काफी लोकप्रिय है। वे अपने लालाट पर खास प्रकार का टीका लगाते हैं।

 

भागवत धर्म ;वैष्णव धर्म

 

भागवत धम के प्रवतर्तक या सात्वत्वंशी श्रीकृष्णवासुदेव थे।

छान्दोग्य उपनिषद में सर्वप्रथम उल्लेख मिलता हैजिसमें श्रीकृष्ण को देवकीपुत्र एवं ऋषि घोर अंगिरास का शिष्य बताया गया है।

जैन परंपरा के अनुसार वासुदेव कृष्ण 22 वें तीर्थकर अरिष्टनोमि के समकालीन थे।

ऋग्वेद में विष्णु आकाश के देवता के रूप में जाने जाते है।

महाभारतकाल में वासुदेव कृष्ण का तादात्म्यविष्णु से स्थापित किया गया है।

भागवत धर्म मुख्यरूप से पाणिनी के काल में अत्यधिक प्रचलित हुआउस काल में वासुदेव की पूजा करने वाले वासुदेव कहलाते थे।

मेगस्थनीज ने इण्डिका’ में कृष्ण को हैराक्लीज’ नाम से वर्णित किया है।

भागवत् धर्म का सिद्धात श्रीमद्भगवतगीता’ में वर्णित है।

भगवतगीता में प्रतिपादित अवतारवाद का सिद्धांत ’ भागवत् धर्म की महत्वपूर्ण विशेषता है।

भागवत् संप्रदाय के नायको का विवरण वायुपुराण’ में मिलता है।

1.संकर्षणरोहिणी पुत्र

2.वासुदेवदेवकी पुत्र

3.प्रद्युम्नरूक्मणी पुत्र

4.साम्बजाम्बवती पुत्र

5.अनिरुद्ध प्रद्युम्न पुत्र

ऐतरेय ब्राह्मण में विष्णु का उल्लेख सर्वोच्च देवता के रूप में किया गया है।

गुप्तकाल में वैष्णव धर्म’ चरमोत्कर्ष पर थागुप्त शासक परमभागवत’ की उपाधि धारण करते थे।

विष्णु का वाहन गरुण’ गुप्त वंश का राजचिन्ह था।

गुप्त काल में ही देवगढ़झांसी का प्रसिद्ध दशावतार मंदिर बनवाया गया था।

 

बल्लभाचार्य और चैतन्य के संप्रदाय : ये दोनों संप्रदाय काफी लोकप्रिय थे। बल्लभाचार्य संप्रदाय की स्थापना एक तेलगु ब्राह्मण बल्लभ ने की थी। उन्होंने अपने शिष्यों को सांसारिक सुखों को त्यागने से मना किया। उन्होंने उपवासों और आत्म दमन का विरोध किया। उनके गुरु भी सुख का जीवन व्यतीत करते थे। चैतन्य के अनुयायी साधारण और विनीत जीवन व्यतीत करते थे। ईश्वर की आराधना के लिए भक्ति संगीत गाते और नृत्य करते थे।

रामानंद : रामानंद इस संप्रदाय के प्रवर्तक थे। रामानंदी मुख्य रूप से उत्तर भारत के गांगेय क्षेत्र में फेले हुए हैं। इस संप्रदाय के लोग मुख्य रूप से विष्णु के अवतार राम की आराधना करते हैं। सभी जातियों के लोग इस संप्रदाय में शामिल हैं। इस संप्रदाय के शिष्यों में से कई निम्न जाति के थे। रामानंद के शिष्यों ने कई उपसंप्रदाय विकसित किए। उनके प्रमुख शिष्यकबीर और दादू के नाम पर क्रमशः कबीर पंथ और दादू पंथ नामक संप्रदाय चलाए।

इसके अतिरिक्त वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख संप्रदाय और उपसंप्रदाय निम्नलिखित है  मलूक दासीराय दासीमीरा बाई संप्रदायमाधवा चारीचैतन्य संप्रदायचरन दासी साधन पंथीराधा बल्लभी इत्यादि।

 

शैव संप्रदाय

 

दशनामी संप्रदाय : आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने शैव धर्म को नया रूप प्रदान किया। उन्होंने दशनामी संप्रदाय के नाम से एक महत्वपूर्ण संप्रदाय की स्थापना की। दशनामियों को वैदिक शैव भी कहा जाता है। दशनामी संप्रदाय की स्थापना के पहले शैव संप्रदाय में कनफटाअधोरीकालमुखी और कापालिकों जैसे तांत्रिक शैवों का वर्चस्व था।

इस संगठन में निम्नलिखित दस कोटियों के सन्यासी शामिल थे। 1. गिरि, 2. पूरी, 3. भारती, 4. वन,  5. पार्वती, 6. अरण्य, 7. सागर, 8. तीर्थ, 9. आक्षम, 10. सरस्वती। शंकराचार्य ने उत्तरदक्षिणपूर्व और पश्चिम में क्रमशः ज्योति पीठशृंगेरी पीठगोवर्धन पीठ और द्वारका या शारदा पीठ की स्थापना की। दशनामी सन्यासी मुख्य रूप से दंडधारियों ;जिसमें कर्मचारी शामिल होते थे और परमहंसों ;जिनमें कर्मचारी नहीं शामिल होते थे में विभक्त है। दशनामी संप्रदाय के 10 उपसंप्रदायों में से तीर्थआश्रम और सरस्वती के संयासियों को यह अनुमति प्राप्त नहीं थी।

दशनामी संन्यासी भी दो प्रमुख भागों अस्त्राधारी (हथीयार रखने वाले) और शास्त्राधारी ;धर्म ग्रंथ रखने वाले में विभक्त हैं। अस्त्राधारी लड़ाकू संन्यासी और शास्त्राधारी विद्वान संन्यासी होते हैं। पहले प्रकार के संन्यासियों को नागर संन्यासी भी कहा जाता है जिन्हें अखाड़ों के माध्यम से संगठित किया जाता है। दशनामी अखाड़े के सात प्रकार है महानिर्वाणी अखाड़ानिरंजनी अखाड़ाजन या भैरव अखाड़ाआवाहन अखाड़ाआनंद अखाड़ानिर्वाणी अखाड़ा।

 

शैव धर्म


शिव के उपासक शैव’ कहलाए एवं इनसे संबंधित धर्म शैव धर्म कहलाया।

शैव धर्मभारत का प्राचीनतम धर्म हे। जिसका साक्ष्य सिन्धु घाटी सभ्यता में प्राप्त होता है।

ट्टग्वेद में शिव का नाम रूद्र’ मिलता है।

उत्तर वैदिक काल में तैत्तिरीय संहिता’ में इनका नाम शिव’ का मिलता है।

अथर्ववेद एवं श्वेताश्वर उपनिषद में शिव’ का नाम महादेव’ मिलता है।

लिंगपूजा का प्रथम उल्लेख मत्स्यपुराण’ में है।

शिव की प्राचीनतम मूर्ति पहली शताब्दी ई. में मद्रास के निकट रेनीगुटां में प्रसिद्ध गुडिमल्लम लिंग’ के रूप में प्राप्त हुआ है।

शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ से पता चलता हैकि प्रजापति द्वारा रखे गये शिव के आठ नामों में से रूद्रशर्वउग्र और अशनि शिव के विध्वंशकारी रूप एवं भवभवपतिईशान तथा महादेव नाम कल्याणकारी रूप थे।

चर्म धारण करने के कारण शिव का कृत्तिवासन की संज्ञा दी गयी।

सूत ग्रंथों में रुद्र की स्त्राति में 12 नाम मिलते हैं।

वामन पुराण में शैव संप्रदाय की संख्या चार है शैवपशुपतकापालिक एवं कालामुख।

शैव संप्रदाय के अनुसार कर्ता शिव हैकारण शक्ति एवं उपादान बिन्दु है।

पाशुपतशैव मत का सबसे प्राचीन संप्रदाय है,  इसके संस्थापक लकुलीश या नकुलीश थे।

पाशुपत संप्रदाय के अनुयायी पंचार्थिक’ कहलाते थेइस मत का प्रमुख सैद्धातिक ग्रंथ पाशुपतसूत्र है।

कापालिक संप्रदाय के ईष्टदेव भैरव थे जिन्हें सुरा तथा नरबलि का नैवैद्य चढ़ाया जाता था।

कालामुख संप्रदाय को शैव पुराण में महाब्रतधर कहा गया हैइस संप्रदाय के अनुयायी नर कपाल में भोजनजल तथा सुरापान करते थे और शरीर पर भष्म लगाते थे।

कश्मीरी शैव संप्रदाय शुद्धरूप से दार्शनिक अथवा ज्ञानमार्गी हैइसे निकदर्शन भी कहा गया है।

त्रिकदर्शन की तीन शाखायें स्पन्दन शास्त्रआगम शास्त्र एवं प्रत्यभिज्ञा शास्त्र है।

कश्मीरी शैव संप्रदाय के प्रर्वतक वसुगुप्त थेजो स्पन्दनशास्त्र’ शाखा के भी पहले दार्शनिक थे।

प्रत्यभिज्ञ शास्त्र के प्रर्वतक सोमानन्द थेजिनकी रचना का नाम शिव दृष्टि’ है।

 

कनफटा या नाथ पंथी


यह संप्रदाय तांत्रिक शैव धर्म का ही हिस्सा है। कनफटे अपने कान में छेद करके उसमें बाली पहनते थे। इस संप्रदाय के पुनः संगठनकर्ता के रूप में गोरखनाथ का नाम आता है। ऐसा माना जाता है कि इस संप्रदाय की स्थापना सतीनाथ ने की थी। कनफटे शिव को सर्वोच्च यथार्थ के रूप में स्वीकार करते थे। शिव में समाहित होकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। नाथ संप्रदाय में नाथ योग और तंत्र को मोक्ष का सर्वथा उपयुक्त साधन माना गया है।

 

अधोरी पंथ


इस संप्रदाय को अघोर पंथ या अवघड़ पंथ के रूप में जाना जाता है और इसके अनुयायियों को अघोरी या अवघड़ कहा जाता है। इस संप्रदाय की स्थापना गोरखनाथ के एक शिष्य ब्रह्मगिरि ने की थी। इस संप्रदाय का नाम अघोर शब्द से बना है जो विशेष तौर पर कभी न डरने वाले शिव के लिए पयुक्त होता है। इससे स्पष्ट है कि अघोर पंथी का अर्थ शिव की आराधना करने वाले संन्यासियों से है। अघोरी अपने सारे शरीर पर श्मशान की राख मले रहते हैं। वे विशिष्ट चिर धारण करते हैं जो हिंदू त्रिपादी की एकता का प्रतीक है।

 

 

वीर शैव या लिंगायत संप्रदाय


लिंगायत मुख्य रूप से दक्षिण भारत में पाए जाते हैं। इस संप्रदाय का नाम लिंग शब्द से बना है। एक पक्का लिंगायत अपने शरीर पर चांदी की छोटी सी मंजूषा पहनता है जिसमें पत्थर का लिंग रखा होता है। यह उसकी आस्था का प्रतीक होता है। जिसके खोने का अर्थ होता है आध्यात्मिक मृत्यु।

इस संप्रदायों में लिंगायत या वीर शैव शिव को अपना आराध्य मानते हैं उनका प्रतीक लिंग धारण करते हैं। लिंगायत संप्रदाय की शुरूआत 12वीं शताब्दी में हुई थी। लिंगायतों का सबसे महत्वपूर्ण आयोजन अष्ट वर्ण है जिसमें आठ अनुष्ठान शामिल हैः गुरुलिंगविभूतिरुद्राक्षमंत्रजंगमतीर्थ और प्रसाद। लिंगायतों को मांस या मदिरा छूने की अनुमति नहीं है।

 

कापालिक पंथ

 

हालांकि यह संप्रदाय लगभग समाप्त हो चुका है लेकिन प्राचीन भारत में यह व्यापक तौर पर फैला हुआ था। कापालिक तांत्रिक होते हैं। वह नदियों के किनारे निर्वस्त्रा रहते हैं। वे मुनष्य के मृत्यु शरीर को खाते हैं। वे बिना किसी संकोच या हिचक के मांस मदिरा का सेवन करते हैं। इनके आराध्य देव काल भैरव हैं।

 

शाक्त संप्रदाय

 

शाक्त योग दर्शन में शक्ति ;नारी शक्ति  को सर्वोच्च सत्ता माना गया है। शिव चित है और शक्ति छिद्रपनी ;शुद्ध चेतना है। शक्ति के आदेश का पालन करते हुए ब्रह्मविष्णु और शिव सर्जनसंरक्षण और संहार का कार्य करते हैं। वह ईश्वर की लीला में हिस्सा लेती हैवह सार्वभौम माता है। दुर्गाकालीभागवती चामुंडी त्रिपुरा सुदंरीराज राजेश्वरी पार्वतीसीताराधा आदि उन्हीं के रूप हैं। शक्तिएक शुद्ध चेतना है। शक्ति में तीन गुण होते हैं सत्यरजक और तमस।  या देवी माता की पूजा करने वाला भक्त शाक्य कहलाता है। शाक्त निम्नलिखित तीन समूहों में विभक्त है।

1. दक्षिणचारी: ये सांसारिक से बिल्कुल मुक्त होते हैं और देवी-देवताओं को रक्त की बलि नहीं चढ़ाते।

2. बामचारी: ये तांत्रिकों के उपदेशों का पालन करते हैं और अपने देवी-देवताओं को खून की बलि चढ़ाते हैं।

3. कवलिक: ये कौल उपनिषद का पालन करते हैं। ये मां जगदम्बा जो सर्वोच्च प्राकृति शक्ति की पूजा करते हैं।

हिंदू धर्म के वर्तमान स्वरूप से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में कई आयाम हुये। यूं तो इस राज के पहले बहुत-सी कुरीतियों विद्यमान थींकिंतु पाश्चात्य सभ्यतासमाज और धर्मों के संपर्क में आने से वे कुरीतियों और उग्र हो उठीं। विशेष तौर पर इस उग्रता को उन्होंने अधिक महसूस कियाजिन्हें आधुनिक शिक्षा और पाश्चात्य ज्ञानविज्ञान तथा दर्शन को समझने का अवसर मिला था। इन लोगों ने हिंदू सामाजिक रचनाधर्म रीति-रिवाज तथा परंपराओं को तर्क के तराजू में तौलने शुरू किया। परिणामसवरूपसामाजिक एवं धार्मिक आंदोलनों का जन्म हुआजिनमें ब्रह्म समाजप्रार्थना समाज और थियोसोफिकल सोसाइटी प्रमुख थे। दूसरी ओर आर्य समाज का जन्म हुआ। वास्तव में आर्य समाज को दोहरी भूमिका निभानी थी एक तरफ हिंदू धर्म से कुरीतियों तथा झूठे विश्वासों को समाप्त करना और दूसरी तरफ ईसाई पदारी प्रचारकों से हिंदू धर्म की रक्षा करना एवं हिंदुओं को ईसाई बनने से रोकना।

 

 

ब्रह्म समाज

 

हिंदू समाज में प्रथम सुधार आंदोलन ब्रह्म समाज फारसी थाजिसके प्रवर्तक राजाराम मोहन राय थे। वह एक बहुत बड़े विद्वान थे। उन्हें अरबीफरसीसंस्कृत जैसी प्राच्य भाषाएँ और अंग्रेजीफांसीसीलैटिनयूनानी और हिब्रू भाषाएँ आती थीं। जिस समय पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित हो बंगाली युवक ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हो रहे थेउस समय राजाराम मोहन राय हिंदू धर्म के रक्षक के रूप में सामने आए। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया और अपने पक्ष को वेद की उक्तियों से सिद्ध करने का प्रयत्न किया। उन्होंने हिंदू धर्म के सिद्धांतों की पुनर्व्याख्या की और अपनी मानव सेवा के लिए उपनिषदों से पर्याप्त प्रमाण ढूंढे। उन्होंने ईसाई मत और यीशू के देवत्व को अस्वीकार कर दियाकिंतु यूरोपीय मानववाद को अवश्य स्वीकार किया। सामाजिक क्षेत्र में फैली कुरीतियों सती प्रथाबहुपत्नी प्रथावेश्यागमनजातिवाद इत्यादि का घोर विरोध किया। विधवा पुनर्विवाह के भी वे प्रबल समर्थक थे। इन्हीं उद्देश्यों को लेकर उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की। उन्होंने कहा कि इस समाज का मूल उद्देश्य उस शाश्वतसर्वाधारअपरिवर्त्यनिराकार ईश्वर की पूजा हैजो समस्त विश्व का कर्ता और रक्षक है। ये स्वयं हिंदू रहे और यज्ञोपवीत पहनते रहे। 1833 में इनकी मृत्यु हो गई। आज भी लोग उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता मानते हैं।

राजा राममोहन राय की मृत्यु के पश्चात् इस आंदोलन को दिशा दी महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर ने। वे इसमें 1842 में शामिल हुए और उन्होंने ब्रह्म धर्मावलम्बियों को मूर्ति पूजातीर्थयात्राकर्मकाण्ड और प्रायश्चित इत्यादि से रोका। इनके बाद केशव चंद्र सेन ने अपनी उदार प्रवृत्ति के कारण कमान संभालीकिंतु इसमें फूट पड़नी शुरू हो गई। 1865 में केशव चंद्र सेन को उनकी प्रवृत्तियों का गठन कियाजिसे आदि ब्रह्म समाज’ कहा गया। 1878 में इस समाज में एक और फूट पड़ी। केशव चंद्र ब्रह्मसमाजियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु का प्रचार करते रहेकिंतु जब उन्होनें अपनी 13 वर्षीय बेटी का विवाह कूच बिहार के महाराज से पूर्ण वैदिक कर्मकाण्ड से कर दिया तो इनके अनुयायियों ने एक नया समाज बनाया और उसे साधारण ब्रह्म समाज’ का नाम दिया। शनै-शनैः यह समाज अपना प्रभाव खोने लगा।

 

आर्य समाज


गुजरात की मौरवी रियासत के एक ब्राह्मण कुल में 1824 में जन्मे मूल शंकर जो बाद में दयानंद के नाम से विख्यात हुएने वैदिक वाघ्मयन्यायदर्शन इत्यादि की शिक्षा ली और गृह त्यागकर 15 वर्षों तक घूमते रहे। 1860 में मथुरा में स्वामी विरजानंद जी से विस्तृत रूप में वेदों को समझा और आत्मसात किया। 1863 में उन्होंने झूठे धर्मों का खण्डन करने के लिए पाखण्ड खण्डिनी  पताका’ प्राचीन वैदिक धर्म को उसके शुद्ध रूप में पुनः स्थापित करना था। इन्होंने वेदो की ओर लौट चलो’ का मंत्र दिया।

वेद और उपनिषद् तक के साहित्य को शुद्ध माना शेष कोविशेषकर पुराणों कोजिनमें मूर्तिपूजादेवी-देवताओं तथा अवतारवाद का विवरण मिलता हैमनगढ़ंत कथाओं का समुच्य माना। उन्होंने मूर्तिपूजाबहुदेववादअवतारवादपशुबलिश्राद्ध और झूठे कर्मकाण्डों को कभी स्वीकार नहीं किया। वे पहले ऐसे सुधारक थेजिन्होंने शूद्र तथा स्त्री को वेद पढ़ने और उँची शिक्षा प्राप्त करनेयज्ञोपवीत धारण करने एवं बराबरी हेतु आंदोलन चालाया। पुत्री को पुत्र के समान माना। बाल विवाशश्वत वैधव्यपरदादहेज सभी बुराईयों को दूर करने का प्रयत्न किया।

इनके सभी विचार उनकी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में संकलित हैं। इन्होंने पाश्चात्य दर्शनशिक्षा और समाज को पूरी तरह नकार दिया। उनका कहना था कि वेद और उपनिषद से परे कुछ नहीं और जिन रिवाजोंपरंपराओंकर्मकाण्डों की अनुमति वेद में नहीं हैंउन्हें त्याग दिया जाए। 1886 में दयानंद एंग्लो वैदिक संस्थाएँ प्रारंभ हुई। 1892-93 में आर्य समाज दो दलों में बंट गया। तथापितआर्य समाज ने धर्म और समाज में फेले अंधकार को दूर करने का प्रयास किया। इतना ही नहीं आर्य समाज ने शुद्ध आंदोलन’ भी चलायाजिसके अंतर्गत लोगों को अन्य धर्मों से हिंदू धर्म में लाने का प्रयत्न किया गया। स्वामी दयानंद के आर्थिक विचारों में स्वदेशी का विशेष महत्व था।

 

रामकृष्ण आंदोलन

 

ब्रह्म समाज का उपदेशात्मक युक्तिवाद कई लोगों को प्रिय न लगा। रामकृष्ण परमहंस भी उनमें से एक थे। ये कलकत्ता की एक बस्ती में पुजारी थे। भारतीय विचार एवं संस्कृति में उनकी पूर्ण आस्था थीपरंतु वे सभी धर्मों को सत्य मानते थे। उनके अनुसार कृष्णहरिरामईश्वरअल्लाह सभी प्रभु के भिन्न-भिन्न नाम हैं। वह मूर्ति पूजा में विश्वास रखते थे और उसे शाश्वतसर्वशक्तिमान ईश्वर को प्राप्त करने का एक साधन मानते थे। परंतुवह  कर्मकाण्ड की अपेक्षा आत्मा पर अधिक बल देते थे। वह ईश्वर प्राप्ति के लिए उसके प्रति निःस्वार्थ एवं अनन्य भक्ति में विश्वास करते थे। उन्होंने तांत्रिकवैष्णव और अद्वैत तीनों साधनाएँ कीपिफर अंत में निर्विकल्प समाधि’ की स्थिति को प्राप्त किया। इसके बाद वे परमहंस कहलाने लगे। रामकृष्ण परमहंस के शिष्यों में से एक नरेंद्र नाथ दत्त थेजो बाद में स्वामी विवेकानंद कहलाए। परमहंस की शिक्षाओं को वास्तविक तौर पर इन्होंने ही साकार किया। उन्होंने उनकी शिक्षा को आम भाषा में प्रस्तुत किया। 1893 में अमरीका के शिकागो में हुए प्रथम विश्व धर्म सम्मेलन’ में उनकी व्याख्यान ने सबको चकित कर दिया था। साथ ही हिंदू धर्म को एक सामाजिक उद्देश्य भी प्रदान किया। उन्होंने कहा कि वे ऐसे धर्म में विश्वास नहीं करतेजो किसी विधवा के आंसू नहीं पोंछ सकता अथवा किसी अनाथ को रोटी नहीं दे सकता। उन्होंने कहाफ्मैं उसी को महात्मा मानता हूँजिसका मन निर्धन के लिए रोता हैअन्यथा वह दुरात्मा है। जब तक लाखों लोग भूख और अज्ञानता में रहते हैंमैं प्रत्येक उस व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूँजो उनके धन से विद्या प्राप्त करता है और फिर भी उनकी तरफ तनिक भी ध्यान नहीं देता। स्वामी विवेकानंद ने परमहंस की मृत्यु के 11 वर्ष पश्चात् 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन समाज सुधार और सेवा के क्षेत्र की अग्रणी संस्थानों में से एक है। अनेक धर्माथ औषधालयचिकित्सालविद्यालय इसके तत्वाधान में चल रहे हैं। विवेकांनद अनन्य देशभक्त थे। भारत के राष्ट्रीय जागरण एवं हिंदू आध्यात्मवाद के उत्थान में उनकी विशेष भूमिका रही है।

 

प्रार्थना समाज


केशन चंद्र सेन की प्ररेणा से 1867 में महाराष्ट्र में इसकी स्थापना की गई। महादेव गोविंद रानाडे इसके अगुआ थे। ब्रह्म समाज और प्रार्थना समाज में मुख्य अंतर यह था कि ब्रह्मसमाजियों ने हिंदू धर्म के कमोबेश बाहर जाकर किसी संगठन की सहायता से हिंदूवाद की आलोचना की जबकि प्रार्थना समाज के अनुयायियों ने हिंदू धर्म में रहकर एक हिंदू के रूप में ही प्रगतिशील सुधारों का समर्थन किया। हिंदुओं की सामाजिक धार्मिक मान्यताओं को युक्तिसंगत बनाना उनका मुख्य उद्देश्य था।

 

थियोसोफिकल सोसाइटी


थियोसिफी शब्द दो यूनानी शब्दों से मिलकर बना-थिओस और सोफियाजिसका अर्थ है ईश्वर और ज्ञान। थिओसोफिकल सोसाइटी उन पश्चिमी विद्वानों द्वारा आरंभ की गई थीजो भारतीय संस्कृति व विचारों से बहुत प्रभावित थे। 1875 में मैडम एच.पी. ब्लावेट्स्की ने कर्नल एम.एस. ओल्काट के साथ इस सोसाइटी की नींव अमेरीका में रखी। 1882 में उन्होंने अपनी सोसाइटी का मुख्य कार्यालय मद्रास के समीप अडयार में स्थापित किया। इस समाज के अनुयायी आत्मिक हषोन्माद और अंतर्ज्ञान द्वारा ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करते थे। ये लोग पुनर्जन्म और कर्म में विश्वास रखते हैं और सांख्य और उपनिषदों के दर्शन से प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

1887 में कर्नल ओल्काट की मृत्यु के पश्चात् मिसेज एनी बेसेन्ट इसकी अध्यक्षा बनीं और इसे काफी लोकप्रिय बनाया। 1893 में वे भारत आई। वह भारतीय विचार और संस्कृति से भलीभांति परिचित थीं और जैसा उनके भगवद्गीता के अनुवाद से प्रतीत होता हैवह वेदांत में विश्वास रखती थीं। शनैः-शनैः वह हिंदू हो गई न केवल विचारों से अपितु वस्त्रभोजनमेलमिलाप और सामाजिक शिष्टाचार से भी। भारत में थियोसोफिकल सोसाइटी उनकी देखरेख में हिंदू पुनर्जागरण का आंदोलन बन गई। 1898 में बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की नीवं रखी गयीजो आगे चलकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बना। इस सोसाइटी ने रूढ़िवादी परंपरा के अनुसार हिंदू धर्म की व्याख्या की और प्राचीन भावना कृण्वने विश्वमार्यम’ को साकार बनाने का प्रयत्न किया।



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