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पयार्वरण एवं संसाधन में संबंध | relationship between environment and resources

 

पयार्वरण एवं संसाधन में संबंध | relationship between environment and resources 


पयार्वरण एवं संसाधन में संबंध

 

संसाधन प्रकृति के संपूर्ण जैव जगत का आधार हैजिन पर जीवों का अस्तित्व निर्भर करता है। मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण के संसाधनों का उपयोग करके ही सांस्कृतिक भू-दृश्य विकसित करता है। मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण के संसाधनो का दक्षता तथा जीवीय श्रेष्ठता के कारण अन्य जीवों से आगे निकल गया है।


मनुष्य ने पर्यावरण के प्रतिराधें से बचने की विधिया भी विकसित कर ली है। बढ़ने मानवीय दबाव का प्रभाव संतुलित पर्यावरण पर पड़ा तथा संसाधनो का ह्नास प्रारम्भ हो गया।

पर्यावरण में सर्वसुलभ संसाधनो (वायु तथा जल) का भी अवनयन होने लगा है। इन संसाधनो की बहुलता तथा नयीकरणीय प्रकृति होने पर भी मौलिक गुणवत्ता का ह्रास हो जाने से पुनस्थार्पन असंभव हो जाएगा। गंगा नदी के जल को विगत पाँच दशकों में इस स्तर तक प्रदूषित कर दिया गया है कि आगामी समय में भी इसका पुनर्स्थापन हो पाना अत्यंत दुष्कर हो जाएगा।

संसाधनो को दोहन तथा पर्यावरण संतुलन एक ऐसा अनूठा संयोजन है जिस पर प्राकृतिक व्यवस्था तथा जीवों का अस्तित्व निर्भर करता है। औद्योगिक क्रांति के उपरांत जीवाश्मीय ईंधन के दोहन तथा हरित गृह प्रभाव में वृद्धि हुई जिसके फलस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ना व संतुलित जलवायु के कदम लड़खड़ाने लगे। इसलिए यह आवश्यक है कि पर्यावरण तथा संसाधन उपयोग के मध्य मैत्रापूर्ण संबंध् स्थापित किया जाए। संसाधन उपयोग के गलत तरीकों से पर्यावरण संकट उत्पन्न हो रहे है

जिन पर नियंत्रण कर पाना आसान कार्य नहीं है। बढ़ते औद्योगीकरण के कारण अम्ल वर्षाओजोन अल्पतातापमान में वृद्धि जैसी ज्वंलत पर्यावरणीय समस्यायें सामने आ रही है।

मनुष्य पर्यावरण का प्रमुख संसाधन हैजो संसाध्न निर्माण एवं दोहन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है।

मानव अपने सांस्कृतिक-आख्रथक अभ्युदय के लिए संसाधनों का विस्तृत दोहन करता आया हैलेकिन अपने विकास में संसाधन के दोहन को अनिवार्य मानने वाला मानव समुदाय पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने से आशंकित है। अतः जहाँ पर्यावरण में स्थित संसाधन मानवीय संवृद्धि के लिए आवश्यक हैवहीं इनका अति दोहन मानवीय अवनति भी कर सकता है। स्पष्ट है

कि संसाध्न एवं पर्यावरण में मैत्रीपूर्ण संबंधें के उपरान्त ही प्राकृतिक संतुलन संभव है जो अन्य जीव-जनतुओं सहित मानकीय समृद्धि का मूलाधार है।

 

जनजागरूकता

मानव का प्रकृति के साथ गत्यात्मक सम्बन्ध है। मनुष्य ने प्रकृति से प्राप्त संसाधनों का उपयोग एक ओर अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किया और दूसरी ओर अपनी सभ्यता के विकास हेतु किया। पर्यावरणीय तत्वों के उपभोग के कारण प्रकृति में परिवर्तन आने आरम्भ हो गए जो सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ-साथ असन्तुलन का रूप लेने लगे। उपभोग की अत्यधिक माँग होने कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा है। जनंसख्या वृद्धितीव्र नगरीकरणऔद्योगीकरणउपभोक्तावादी जीवन दर्शनभौतिकवादी जीवनशैलीसामाजिक मूल्यों का ह्रासदोषपूर्ण प्रतिविधि गतिशीलता तथा वर्गीय एवं क्षेत्राय असंतुलन आदि समस्याएँ सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण के लिए संकट लेकर आई हैं।

इस समस्याओं पर वैश्विक एवं समग्र दृष्टि की आवश्यकता है। इस हेतु पर्यावरण सम्बन्धी जन चेतना का विकास होना अत्यन्त आवश्यक है। नवीन जानकारियों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए जन-चेतना अथवा जनजागरूकता की आवश्यकता पड़ती हैं। पर्यावरण सम्बन्धी विभिन्न पक्षों को समझनेउसका संरक्षण एवं संवर्धन करने केलिए पर्यावरणीय ज्ञान होना आवश्यक है।

पर्यावरणीय अध्ययन में पर्यावरण का मानव पर और मानव का पर्यावरण पर जो प्रभाव पड़ता हैउसका अध्ययन किया जाता है। दूसरे शब्दों मेंमानव एवं पर्यावरण की अन्तर्क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इतना स्पष्ट है कि मानव ने आज तक अपनी विकास यात्रा में पर्यावरण के साथ जो क्रियाकलाप किए हैं उन्होंने पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है जिससे पर्यावरण ह्रास और असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हुई है। अतः यह अत्यन्त आवश्यक है कि पर्यावरण के साथ मानव की अर्न्तक्रिया के तरीकों को परिवर्तित किया जाय अर्थात् मनुष्य द्वारा वे कार्य किए जाएं जिनसे प्राकृतिक संरक्षण एवं संवर्धन में सहायता मिले और प्रदूषण तथा पर्यावरण ह्रास को रोका जा सके। इन कार्यों को जनमानस में पर्यावरण चेतना उत्पन्न करके ही सम्पन्न किया जा सकता है।

भारत में प्राचीन काल से ही पर्यावरण प्रति संवेदनशीलता और मित्रवत व्यवहार के साक्ष्य मिलते हैंन केवल मित्रावत बल्कि प्राकृतिक तत्वों को दैव स्वरूप दिया गया और मानव अपने को उसका पुत्र बताया। लेकिन इतिहास इस बात का भी गवाह रहा है कि पर्यावरण के प्रति मानव का व्यवहार हमेशा दैव तुल्य नहीं रहा मानव का व्यवहार बदलता रहा है अर्थात समय के साथ-साथ जिस पर्यावरण को देवत्व का स्थान दिया गया वह समय के साथ उपभोग की वस्तु भी बना अर्थात मानव का प्रकृति के साथ गत्यात्मक सम्बन्ध् है। ‘' डाउन्स’ महोदय ने तो इसको एक सिद्धान्त के रूप में कहने का प्रयास किया कि मानव पर्यावरण के प्रति अपने व्यवहार और दिलचस्पी को समय के साथ पाँच अवस्थाओं में सम्पन्न करता है। डाउन्स’ ने पर्यावरण की समस्याओं में जनसमुदाय की अभिरूचि को मुद्दा ध्यानाकर्षण चक्र’ नाम दिया।

ए. डाउन्स के अनुसार पर्यावरणीय समस्याओं में जनसमुदाय की दिलचस्पी समय के साथ बदलती रहती है तथा परिवर्तन का पूर्ण अनुक्रम पाँच अवस्थाओं में सम्पन्न होता है। डाउन्स ने पर्यावरण की समस्याओं में जनसमुदाय की अभिरूचि को मुद्दा ध्यानाकर्षण चक्र’ नाम दिया। इसमें उन्होंने निम्न पाँच अवस्थाओं को बताया-

1. प्रथम अवस्थाः समस्या पूर्व की स्थिति होती है। इस समय जन साधरण का समस्या के प्रति कोई ध्यान नहीं दिया या पर्यावरण पर दिलचस्पी लेने वाले कुछ लोग ही आकर्षित होते हैं।

2. द्वितीय अवस्थाः जब पर्यावरण समस्याएं भयावह होने लगती है तब जनसाधरण पर्यावरण के प्रति आकुल और उत्साहित होने लगता है। इस समस्या से निबटने के लिए लागत की भी परवाह नहीं करता।

 

3. तृतीय अवस्थाः इस अवस्था में जनसाधरण को यह मान हो जाता है कि सिर्फ लागत खर्च ही इस मुद्दे या समस्या का हल नहीं।

4. चतुर्थ अवस्थाः जन साधरण की उदासीनता की स्थिति क्योंकि पर्यावरणीय सुधर योजनाओं में लागत अधिक साथ ही जनसाधरण को यह बोध हो जाता है कि पर्यावरणीय सुधार कार्यक्रमों का क्रियान्वयन उसके लिए अत्यध्कि कठिन है तथा खर्च की गई धनराशि तथा संलग्न जनशक्ति की तुलना में मिलने वाला त्वरित लाभ बहुत कम है।

5. पंचम अवस्थाः समस्या उपरान्त की अवस्था है जब पर्यावरणीय समस्या पर अचानक जनसाधरण की दिलचस्पी बढ़ जाती है। परन्तु जब खतरा टल जाता है तो लोगों की दिलचस्पी पुनः कम हो जाती है।

पर्यावरण में जनसाधरण की दिलचस्पी के उपर्युक्त चक्रीय रूपरेखा के आधार पर डाउन्स का मत है वर्तमान समय में जनसाधरण की दिलचस्पी तथा जागरूकता उपर्युक्त चक्र के माध्यम से गुजर रही है तथा भविष्य में उसके समाप्त हो जाने की सम्भावना है।

इस तरह से यह स्पष्ट है कि मानव ने आज तक अपनी विकास यात्रा में पर्यावरण के साथ जो क्रियाकलाप किए है उससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ा है जिससे पर्यावरण ह्रास और असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हुई है।

हमारे देश में 1973 का चिपको आन्दोलन’ पर्यावरण चेतना का सूत्रघाट सिद्ध हुआ है। लोगों को पर्यावरण क्षति से उत्पन्न दुर्जेय परिणामों के बारे में जागरूक करना होगाअगर कड़े सुधारात्मक कदम नहीं उठाये गये तो जीवन का अन्त हो सकता है। हम विभिन्न पर्यावरणीय समस्याओं का सामना कर रहे है इन चुनौतियों को देश का परिचित या वाकिफ कराना आवश्यक है जिससे उनका व्यवहार या कृत्य पर्यावरण अनुकूल हो सकता है। ऐसे कुछ समस्याएं निम्न है-



जिनसे जनता को जागरूक करना आवश्यक है-

1. बढ़ती जनसंख्याः प्रत्येक वर्ष 10 लाख से भी अध्कि जनसंख्या 2.11» से बढ़ रही है। जबकि प्रत्येक वर्ष 17 लाख से अधिक जनसंख्या जुड रही है। यह लगातार प्राकृतिक संसाध्नों पर दबाव बढ़ा रहा है। और विकास की गति को भी बंद कर रहा है। अतः हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती जनसंख्या वृद्धि को सीमित करना है। यद्यपि विकास स्वतः ही जनसंख्या की वृद्धि को नियंत्रित करता है लेकिन वर्तमान में जनसंख्या ही विकास के लिए बाध बन रही है। यह महिलाओं के विकास के लिए भी आवश्यक है।

2. गरीबीः भारत के बारे में यह हमेशा कहा गया है कि अमीर देश लेकिन गरीब जनता। गरीबी और पर्यावरणीय अवनयन का आपसी सम्बन्ध है। एक बहुत बड़ी जनसंख्या अपनी आधरभूत आवश्यकता के लिए प्राकृतिक संसाधनो पर निर्भर है जैसे खाद्यउर्जा आदि के लिए। लगभग 40% जनसंख्या अभी भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।

3. कृषिक विकास- लोगों को निश्चित रूप से इस बात की जानकारी चाहिए बिना पर्यावरण को क्षति पहुँचाए कृषि विकास को सुनिश्चित करें। क्योंकि उच्च उत्पादकता वाली फसलों से मिट्टी के भौतिक गुणों में परिवर्तन ला देता है और उपजाउ भूमि बंजर भूमि में बदलने लगती है।

4. पानी की आवश्यकताः भूमिगत जल के उपयोग की पुर्नव्याख्या करने की आवश्यकता है। शहरी कूड़ाऔद्योगिक कारखानेरासायनिक उर्वरक और कीटनाशक आदि सतही जल के साथ-साथ भूमिगत जल को भी प्रदूषित करते है। यह एक चुनौती है कि हम अपने नदियों और झीलों के पानी की गुणवत्ता को पुनः कैसे बहाल करें।

5. विकास और वनः वन नदियां और भूमिगत जल के लिए जलग्रहण की सेवा देते है पानी की बढ़ती मांग तथा सिचाई परियोजनाओं के द्वारा जल दोहन की शक्तिशाली योजनाएं भी है। इन परियोजनाओं से बने विशाल बाँधें से जंगल डूबनास्थानीय लागों का विस्थापनजीवों का विस्थापन आदि की समस्या ने एक राजनीतिक और वैज्ञानिक बहस के क्षेत्र बन गये है।

6. भूमि का अवनयनः देश की कुल 329 मि. हेक्टेयर भूमि का केवल 266 मि.हे. भूमि ही उपजाउ है। इसमे से 143 मि.हे. कृषि भूमि और 85 मि.हे. अतिरिक्त भूमि क्षरण से ग्रस्त है। और बची हुई 123 मि.हे. में से 40 मि.हे. पूरी तरह से बंजर भूमि है तथा शेष 83 मि.हे. वन भूमि के रूप वर्गीकृत की जाती है। लगभग 406 मिलियन पशुओं के पशुचारण भूमि 13 मि.हे. ही है अथवा पशुचारण के लिए

वर्गीकृत भूमि 4 प्रतिशत ही है। इसलिए हमारी 266 मिहे. का 175 मि.हे. अथवा 66 प्रतिशत भूमि का भिन्न-भिन्न प्रकार से विकृति हो रही है। लगभग 150 मि.हे. भूमि का अपरदन पानी और हवा के द्वारा होता है इसमें भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

7. संस्थाओं का पुनःस्थापनः आज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अनुकूल संस्थाओंव्यवहार और आधारभूत ढाँचे की पुनः स्थापना या पुनर्गठन किया जाना चाहिए। यह बदलाव भारत के संसाध्नों के उपयोग और प्रबंधन के परम्परागत तरीकों में किया जाना चाहिएयह बदलाव शिक्षारवैयाप्रबंधन के तरीकों और संस्थाओं में किया जाना चाहिए। क्योंकि यह लोगों के तकनीकविचारों और विकास के सोच को बदलने में प्रभावी होता है।

8. आनुवांशिक विविधता में ह्रासः आनुवांशिक विविधता के संरक्षण के लिए विविध् कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। वर्तमान में बहुत से जंगली जीव प्रकृति से विलुप्त हो गये है। एशियाई शेर सहित बहुत से आनुवांशिक विविधता वाले जीवों के नुकसान की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। संरक्षित क्षेत्र जैसे-राष्ट्रीय पार्कजैवमण्डलसेन्चुरी आदि में आनुवंशिकीय संख्या कम होती है जिससे दूसरे अनुवांशिकीय गुणों वाले जीवों से जनन क्रिया नहीं हो पाती जिससे इनमें नकारात्मक बदलाओं आते है। अनुवंशकीय विविधता में कमी की जांच के लिए सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।

9. नगरीकरण के दुष्परिणामः भारत की लगभग 27% जनसंख्या शहरों में निवास करती है। शहरीकरण और औद्योगिकरण ने भारी संख्या में पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म दिया है जिनमें अविलम्ब ध्यान देने की आवश्यकता है। 30% से ज्यादा शहरी आबादी मलिन बस्तियों में रह रही है। भारत के कुल 3245 कस्बो और शहरों में केवल 21 ही ऐसे शहर है जिनमें पूरी तरह या आधे अधूरे ही सीवेज सुविधा और इलाज सुविध है। अतः हो रहा तीव्र नगरीकरण का मुकाबला एक चुनौती है।

10. वायु और जल प्रदुषणः हमारे अधिकांश औद्योगिक संयंत्र या तो पुरानी तकनीक पर कार्य कर रहे है या अस्थायी सुविधाओं का उपयोग कर रहे है। शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में वायु और जल की सबसे खराब रूप में पहचान की गयी है। इनसे सम्बंधित अधिनियम तो देश में बना दिये गये लेकिन उनको लागू करना आसान नहींकारण उनके क्रियान्वयन के लिए अध्कि संसाधन तकनीक और विशेषज्ञता के साथ-साथ राजनीतिक इच्छा शक्ति और सामाजिक इच्छा की भी आवश्यकता होती है। फिर

भी लोगों को नियमों के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है। उनका समर्थन नियमो को लागू करने के लिए अपरिहार्य है।

इस तरह के अधूरे लक्ष्यों की पूर्ति के लिए व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है जो पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से प्राथमिक स्तर से उच्च स्तरत की कक्षाओं में सामाजिक क्रियाओं के माध्यम से स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से सभी मुद्दों पर सोचनेसमझने और कुछ सार्थक कर सकने की रूचि जगानी होगी

 

 

 

FAQ

 

मानव और पर्यावरण का क्या संबंध है?

मानव प्रत्येक प्रकार के क्रियाकलापों के लिए पर्यावरण पर निर्भर है। मानव एक कलाकार के रूप में पर्यावरण द्वारा प्रदत्त रंगमंच (Stage) पर कार्य करता है। कहीं पर्यावरण उसे प्रभावित करता है तो कहीं वह उसके साथ अनुकूलन तथा परिवर्तन (Adaptation and Modification) करता है। इसे पर्यावरण समायोजन (Adjustment) भी कहते हैं।

 

 

मानव और पर्यावरण का घनिष्ट संबंध कैसे है?

प्रकृति मानव की सहचारी है। सृष्टि के जीवों में मानव एक मात्र प्राणी हैजिसे यह योग्यता प्राप्त है कि वह आर्थिकसामाजिकराजनीतिक और तकनीकी क्रिया के द्वारा पर्यावरण के भौतिक परिवेश में परिवर्तन करके सांस्कृतिक परिवेश की रचना करता रहा है।

 

 

पर्यावरण का मानव जीवन में क्या महत्व है?

'पर्यावरण का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। ये हरे-भरे पेड़-पौधे हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जलथलवायुअग्निआकाश इन्हीं पांच तत्वो से ही मनुष्य का जीवन हैऔर जीवन समाप्त होने पर वह इन्हीं में विलीन हो जाता है।

 

 

पर्यावरण शिक्षा का क्या महत्व है?

पर्यावरण शिक्षा एक पुनीत कार्य हैजिसे करके एवं उसके मार्ग पर चलकर वर्तमान के साथ भविष्य को सुंदर बना सकते हैंमानव की अनेक त्रासदियों से रक्षा कर सकते हैंप्राकृतिक आपदाओं को कम कर सकते हैंविलुप्त होते जीव-जंतुओं व पादपों की प्रजातियों की रक्षा कर सकते हैं और जलवायु एवं भूमि को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं|

 

 

पर्यावरण जागरूकता का अर्थ बताइए तथा इसके उद्देश्य क्या है?

पर्यावरण जागरूकता पर्यावरण सम्बन्धी तथ्योंप्रत्ययोंप्रक्रियाओं का ज्ञान तथा बोध कराया जाता है। पर्यावरण के कारकों तथा घटकों की पारस्परिक निर्भरतासमस्याओं तथा समाधान की जानकारी प्रदान की जाती है। पर्यावरण में प्रदूषणों की जानकारी दी जाती है और प्रदूषकों का भी ज्ञान दिया जाता है।

 

 

मानव और पर्यावरण का घनिष्ठ संबंध कैसे है?

प्रकृति मानव की सहचारी है। सृष्टि के जीवों में मानव एक मात्र प्राणी हैजिसे यह योग्यता प्राप्त है कि वह आर्थिकसामाजिकराजनीतिक और तकनीकी क्रिया के द्वारा पर्यावरण के भौतिक परिवेश में परिवर्तन करके सांस्कृतिक परिवेश की रचना करता रहा है।

 

 

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