About Me

header ads

पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता को समझाइए| explain ecosystem productivity

पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता को समझाइए| Explain Ecosystem Productivity


उत्पादकता (Productivity )

किसी भी परितंत्र के क्रियाशील एवं स्थायी बने रहने के लिये सौर ऊर्जा काफी जरूरी है। सौर विकिरण की उपस्थिति में ही प्रकाश संश्लेषण क्रिया के दौरान प्राथमिक उत्पादक (सभी हरे पौधेहरी पीली बैक्ट्रियानीले हरे शैवाल तथा फाइटोप्लैक्टान) अपना भोजन बनाते है। उत्पादकों के इस भोजन को हम ऊर्जा के रूप में जानते हैं। अतः किसी क्षेत्र में उत्पादकों द्वारा प्रति इकाई क्षेत्र मेंप्रति इकाई समय में संचित सकल ऊर्जा की मात्रा को उत्पादकता या प्राथमिक उत्पादन कहते हैं।

इस प्रकार प्राथमिक उत्पादन प्रकाश संश्लेषण के दौरान उत्पादकों द्वारा एक निश्चित समयावधि में प्रति इकाई क्षेत्र के द्वारा उत्पन्न किये गये जैविक मात्रा (कार्बन-सामग्री) की मात्रा होती है।

 

उत्पादकता का मापन

प्राथमिक उत्पादन या उत्पादकता का मापन दो रूपों में किया जाता है-

1 सकल प्राथमिक उत्पाद

2. नेट प्राथमिक उत्पादन

पोषण स्तर-1 पर प्राथमिक उत्पादकों द्वारा उत्पन्न संपूर्ण ऊर्जा को सकल प्राथमिक उत्पादन कहते हैं। जबकि पोषण स्तर-1 पर ही उत्पादकों द्वारा श्वसन के खर्च के बाद बचे हुई (संचित) ऊर्जा को नेट-प्राथमिक उत्पादन कहते हैं।  ध्यातव्य है कि प्राथमिक उत्पादन ही अगले पोषण स्तर को सुलभ होता है।

द्वितीयक उत्पादकता या नेट समुदाय उत्पादन द्वितीयक उत्पादकता में उपभोक्ताओं के नये वर्ग (पोषण स्तर एक को छोड़कर) अर्थात आगे के पोषण स्तर पर कार्बनिक तत्वों के निर्माण की दर को शामिल किया जाता है।

 

भिन्न-भिन्न पारितंत्रों में प्राथमिक उत्पादकता में अन्तर

पृथ्वी पर स्थिति विभिन्न प्रकार के पारितंत्रों में प्राथमिक उत्पादकता भिन्न-भिन्न होती है। विषुवत रेखा से ध्रुवों की तरफ जाने पर (कुछ अपवादों को छोड़कर) प्राथमिक उत्पादकता में कमी होती जाती है। इसी तरह धरातल का लगभग 70% भाग समुद्र का होने के बावजूदस्थल की अपेक्षा समुद्री परितंत्र की उत्पादकता कम होती है। भूमण्डलीय पारिस्थितिकी तंत्र की प्राथमिक उत्पादकता में स्थानीयप्रादेशिक एवं विश्वस्तरीय भिन्नता पायी जाती है। भिन्नता के आधार ओडम (1959) ने विश्व को अधोलिखित तीन उत्पादकता स्तरों में विभाजित किया है-

1. उच्च पारिस्थितिकी उत्पादकता प्रदेश: उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रजलोढ़ मैदानज्वारनदमुख क्षेत्रगहन कृषि क्षेत्र आदि।

2.  मध्यम पारिस्थितिकीय उत्पादकता प्रदेश: घास क्षेत्रझीले आदि।

3.  निम्न पारिस्थितिकीय उत्पादकता प्रदेश: गम्भीर सागरीय क्षेत्रमरूस्थलीय प्रदेशआर्कटिक क्षेत्र आदि।

 

 

पारिस्थितिकीय उत्पादकता

पारितंत्र औसत नेट प्राथमिक उत्पादकता (शुष्क ग्राम/मी2/वर्ष)

उष्ण कटिबंध वन 2000

शीतोष्ण कटिबंधी वन 1300

उष्ण सवाना क्षेत्र 700

कृषि क्षेत्र 650

घास क्षेत्र 600

टुण्ड्रा क्षेत्र तथा अल्पाइन 140

खुलेसागर 125

रेगिस्तानी क्षेत्र 03-70

समस्त सागरीय क्षेत्र 155

ज्वारनद मुख 2000

समस्त पृथ्वी (औसत) 320

 

पारितंत्रीय उत्पादकता को प्रभावित करने वाले कारक

किसी भी पारितंत्र की उत्पादकता को प्रभावित करने वाले कुछ कारण निम्नवत हैः-

1. पारितंत्र में वनस्पतियों की सुलभता एवं उनके ऊर्जा उपयोग की क्षमता।

2. पोषकों की उपलब्धता।

3. जलवायु संबंधी कारक जैसे- तापमानवर्षाप्रकाशमिट्टी एवं जल की उपस्थितिढाल एवं गहराई।

4. विभिन्न प्रजातियों के बीच पारस्परिक क्रियायें- सकारात्मकनकारात्मक सम्बन्ध (सहभोजितापरभक्षणपरजीवितापरस्पर-सहयोगप्रतिस्पर्धा) आदि।

5. विभिन्न प्रजातियों बीच सामाजिक संगठन तथा सामाजिक पदानुक्रम।

 

 

पारिस्थितिकी से संबंधित शब्दावली


1. जनसंख्या पारिस्थितिकीः इसके अन्तर्गत एक जाति के जीवों के मध्य पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।

2. बायोम पारिस्थितिकीः इसके अन्तर्गत किसी क्षेत्र विशेष में समान जलवायु संबंधी दशाओं के अन्तर्गत एक से अधि्क जैविक समुदायों के अनुक्रम की विभिन्न अवस्थाओं में पारस्पारिक क्रियाओं तथा अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

3. जन्तु पारिस्थितिकीः इसके अन्तर्गत विभिन्न जन्तुओं के आपसी तथा उनके वातावरण के साथ संबंधें का अध्ययन करते है।

4. आवास पारिस्थितिकीः इसके अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों के जीवधरियों के आवासों का अध्ययन उनके पर्यावरण के परिप्रेक्ष्य में किया जाता है।

5. मानव पारिस्थितिकीः पारिस्थितिकी की इस शाखा के अन्तर्गत मानव जीवनयापन पर प्रभाव डालने वाले विभिन्न कारकों का अध्ययन किया जाता है।

6. संरक्षण पारिस्थितिकीः इसके अन्तर्गत प्राकृतिक संसाधनों के उचित प्रयोग तथा प्रबन्धन का अध्ययन किया जाता है। प्राकृतिक संसाधनो में वनवन्यजीवभूमिजलप्रकाश तथा खनिज आदि आते है।

7. नेक्टनः अप्रकाशित मण्डल में रहने वाले जीवों को नेक्टन कहते है। किसी सागर में 200 मीटर से अध्कि गहराई वाले मण्डल को अप्रकाशित मण्डल कहते हैक्योंकि सूर्य की किरणें 200 मीटर के नीचे नहीं जा पातीं।

8. इकोटोनः दो बायोम के मध्य का संक्रमणकालीन या अति व्यापन का क्षेत्र होता है जिसमें दोनों बायोम के जन्तु तथा पादप पाये जाते हैं।

9. कृषि पारिस्थितिकीः यह कृषि फसलों और उनके वातावरण के मध्य पारस्परिक संबंधें का अध्ययन है।

10. यूट्रोपिफकः तालाब जैसे वे जल क्षेत्र जिसमें पर्याप्त मात्रा में पोषक पदार्थ होते है तथा जो पौधें की तीव्र वृद्धि के लिए उपयुक्त होता हैयूट्रोफिक कहलाता है। यहाँ पौधों तथा जल जन्तुओं की भरमार होने की घटना यूट्रोफिकेशन कहलाती है।

11. पारिस्थितिकी अनुक्रमणः जब किसी पारिस्थितिकी तंत्र में एक जैव समुदाय का स्थान कालान्तर में दूसरे जैव समुदाय द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है तो उसे पारिस्थितिकी अनुक्रमण कहते हैं।

12. पारिस्थितिकीः पारिस्थितिकी तंत्र में एक प्रजाति द्वारा दूसरे का अनुक्रमण समय के साथ मंद पड़ जाता है तथा धीरे-धीरे प्रजाति निश्चित स्वरूप प्राप्त कर लेती है जिसमें बदलाव बहुत अल्प होता हैइस दशा को पारिस्थितिकी चरम कहते हैं।

13. पारिस्थितिकीयः किसी पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण व इसको चलाने में जीवधरी (पौध या जन्तु) एक निश्चित कार्य करता है और इस तंत्र में प्रत्येक जीवधरी का अपना एक पद होता है। पारिस्थितिकी तंत्र में एक पौधे या जन्तु के कार्य को पारिस्थितिकी निक कहते है।

13. अनुकूलनः पौधे एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैफलस्वरूप उन्हें एक निश्चित वातावरण के प्रभाव को सहन करना पड़ता है। वातावरण के प्रभाव से पौधें की रचना एवं आकृति में परिवर्तन हो जाता है जिससे ये वातावरण में होने वाले परिवर्तन को सहन कर सकें। पौधें के इन गुणों को अनुकूलन कहते हैं।

 

 

खाद्यान्न उत्पादकता के प्रभाव

भूमि एवं मृदा पर प्रभावः मनुष्य ने अपनी खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भूमि को समतल कर कृषि करना शुरू किया अर्थात् मानव ने भूमि तथा स्थलाकृतियों के भौतिक स्वरूप में परिवर्तन कियावहीं कृषि कार्य हेतु भूमि उपयोग में परिवर्तनरासायनिक उर्वरकों व कीटनाशक रसायनों का अत्यधिक प्रयोग आदि से मृदा प्रदूषित हुई है। जिसके कारण मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवों की संख्या में कमी आई है।

जल प्रदूषणः विशाल जनसंख्या की खाद्यान्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मानव द्वारा निचली भूमि व आच्छादित सागरीय जल को सुखाकर (नीदरलैंड जैसे देशों में) उसे स्थल में परिवर्तित करके उसका प्रयोग कृषि हेतु किया जा रहा हैं इस प्रकार जहाँ प्राकृतिक जलाशयों की संख्या में निरंतर कमी से जल संकट उत्पन्न हो गया है वहीं कृषि हेतु अत्यधिक सिंचाई तथा रासायनिक उर्वरक व ज़हरीले कीटनाशकों के प्रयोग से जल प्रदूषण की समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही है।

वायुमंडलीय प्रदूषण: खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों से उत्पन्न होने वाला प्रदूषण तथा कृषि अपशिष्टों के खुले में निस्तारण आदि से वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुई हैं।

प्राकृतिक वनस्पतियों का क्षरण: विभिन्न प्राकृतिक वनस्पतियों के कारण जहाँ एक ओर मानव को विभिन्न खाद्य पदार्थ उपलब्ध हुए हैं वहीं उष्ण व उपोष्ण कटिबंधीय देशों में तीव्र गति से वर्तमान जनसंख्या के भरण पोषण हेतु वनभूमियों को साफ कर उन पर खेती की जा रही है। इन सभी गतिविधियों के कारण निर्वनीकरण से विभिन्न पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही है। वर्ष 2019 की यू. एन. रिपोर्ट के अनुसारउष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वनों को आश्चर्यजनक रूप से नष्ट किया जा रहा है। वर्ष 1980 और वर्ष 2000 के बीच 100 मिलियन हेक्टेयर उष्णकटिबंधीय वन नष्ट किये जा चुके हैं।

जीव-जंतुओं पर प्रभावः खाद्यान्न आवश्यकतों की पूर्ति हेतु पशुओं एवं पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों का अवैध रूप से शिकार किया जा रहा है जिससे उनकी प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर है। जिससे जैव विविधता के समक्ष संकट उत्पन्न हो गया हैपारिस्थितिकी संतुलन में प्राकृतिक वनस्पतियों की तरह पशुओं (जंतुओं) का भी योगदान है। अतः इनकी विलुप्त से विभिन्न पारिस्थितिक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। वर्ष 2019 की यू. एन. रिपोर्ट के अनुसारमानव गतिविधियों के कारण 10 लाख प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

इस प्रकार अनियंत्रित व असंतुलित रूप से खाद्यान्न उत्पादन के द्वारा पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न जैविक व अजैविक घटकों में असंतुलन उत्पन्न हो रहा है। अतः आज जहाँ एक ओर विशाल जनसंख्या के जीवन हेतु खाद्यान्न का उत्पादन आवश्यक है वहीं पारिस्थितिक तंत्र में भी संतुलन रखना आवश्यक है। अतः वर्तमान में कृषि हेतु उन्नत तकनीक प्रयोगफसल चक्रण जैसी कृषि विधियोंउन्नत सिंचाई तकनीकोंऔद्योगिक प्रबंधनकृषिशिक्षा एवं जागरूकता आदि के प्रयोग व सरकारी प्रयासों द्वारा संतुलित रूप से खाद्यान्न उत्पादकता व पारिस्थितिकी सामंजस्य बनाए जाने हेतु प्रयास किये जाने चाहिये।


 

 

FAQ

 

इकोलॉजी के जनक कौन हैं?

इकोलॉजी अर्थात पारिस्थितिकी (जर्मन: Oekologie) शब्द का प्रथम प्रयोग 1866 में जर्मन जीव वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैकल ने अपनी पुस्तक "जनरेल मोर्फोलॉजी देर ऑर्गैनिज़्मेन" में किया था।

 

भारत में पारिस्थितिकी तंत्र के जनक कौन हैं?

एक पारिस्थितिकी तंत्र एक समुदाय है जिसमें जैविक और अजैविक दोनों घटक शामिल होते हैं और एक दूसरे और पर्यावरण के साथ उनकी अंतर्क्रियाएँ होती है। अत: उपर्युक्त बिंदुओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि रामदेव मिश्र को भारत में पारिस्थितिकी का जनक माना जाता है।

 

पारिस्थितिक तंत्र में उत्पादक कौन होते हैं?

पौधे पारिस्थितिक तंत्र में प्राथमिक उत्पादकहोते हैं

 

पारिस्थितिक तंत्र कितने प्रकार के होते हैं?

पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार

1. प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र

2. मानव निर्मित पारिस्थितिक तंत्र

प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के प्रकार

1. स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Terrestrial ecosystem)

2. जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic ecosystem)

 

मानव निर्मित पारिस्थितिकी तंत्र के प्रकार – Types Of Man-Made Ecosystem In Hindi

कृषि पारितंत्र

वृक्षारोपण पारितंत्र

नगरीय पारितंत्र

एग्रीकल्चर पारितंत्र

बाँध पारितंत्र

जलाशय पारितंत्र

ग्रामीण पारितंत्र

आद्यौगिक पारितंत्र

प्रयोगशाला पारितंत्र

 

 

पारिस्थितिक तंत्र से क्या तात्पर्य है?

पारितंत्र (ecosystem) या पारिस्थितिक तंत्र (ecological system) एक प्राकृतिक इकाई है जिसमें एक क्षेत्र विशेष के सभी जीवधारीअर्थात् पौधेजानवर और अणुजीव शामिल हैं जो कि अपने अजैव पर्यावरण के साथ अंतर्क्रिया करके एक सम्पूर्ण जैविक इकाई बनाते हैं। इस प्रकार पारितंत्र अन्योन्याश्रित अवयवों की एक इकाई है जो एक ही आवास को बांटते हैं।

 

 

दोस्तों हमें कमेन्ट के ज़रिए बतायें कि आपको हमारा आर्टिकल कैसा लगायदि अच्छा लगा हो तो आप इसे सोशल मीडिया पर अवश्य शेयर करें यदि इससे सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो नीचे कमेन्ट करके हमसे पूंछ सकते है धन्यबाद !

 


 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ