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पादप हार्मोन, रोग विज्ञान एवं प्रमुख रोग | Plant Hormones | Plant Diseases

प्रमुख पादप हार्मोन


फल वृक्षों की विभिन्न गतिविधियों मेंजैसे वृद्धिफल आनाफूलनाजड़ निकलनाफल आकार वृद्धिफल को पकानाअसमय फल का गिरना आदि गतिविधियों के संपन्न होने में पादप हार्मोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनमें प्रमुख हैं- आक्जिन्ससाइटोकाइनिन्सजिब्रेलिन्स एवं इथाइलीन।


आक्जिन्स 

प्राकृतिक रूप से नई पत्तियों तथा उपरी सिरे की कलियों में बनता है और बाद में यह उपर से नीचे की तरफ आ जाता है। यह तने की वृद्धिकलम में जड़ों का प्रेरणफलों के विकासपार्श्व कलिकाओं के वृद्धि को रोकनाशीर्ष प्रभाविताविगलन पर्त के निर्माण का रोकनाखरपतवार को नष्ट करनाबीजों को सुसप्ता में बनाये रखना आदि महत्वपूर्ण कार्य हैं।


जिबे्रलिन 

जिबे्रलिन का प्रमुख कार्य आनुवांशिक रूप से छोटे पौधों को बड़ा कर देना है। अन्य प्रमुख कार्यो मेंबीज एवं कंद की सुसुप्ता तोड़नाबीज रहित फल का निर्माणअंगूर आदि फलों को बड़ा करने में महत्वपूर्ण योगदान होता है।


साइटोकाइनिंस 

कोशिका विभाजन तथा जीर्णावस्था को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।


इथाइलीन 

इथाइलीन को फल पकाने वाला हार्मोन्स कहते हैं।यह एक उड़नशीलगैसीय रूप में पाया जाने वाला हार्मोंस है। एसिटिलीन तथा प्रोपाइलीन भी फलों को पकाते है।

इथाइलीन का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य पत्तियोंफलों और तना के बीच विगलन पर्त का निर्माण कर असमय पत्तियों या फलों का गिरा देना।


पौधों के आवश्यक 16 पोषक तत्व

मुख्य तत्व 

कार्बनआक्सीजनहाइड्रोजननाइट्रोजनफाॅस्फोरसपोटैशियमकैल्सियममैगनीशियमगंधक।

सूक्ष्म

लोहामैंगनीजतांबाजस्ताबोरोनमोलिब्डेनमक्लोरीन।


प्रमुख पादप रोग


पौधों/फसलों/फलों में तत्वों की कमी से उत्पन्न रोग


नींबू में डाईबैक’ रोग कापर की कमी से होता है।

आँबले में आन्तरिक निक्रोसिस’ रोग बोरान की कमी से होता है।

नींबू में लिटिल लीफ’ रोग कापर की कमी से होता है।

आम एवं बैंगन में लिटिल लीफ’ रोग जस्ते की कमी से होता है।

लीची में पत्ती जलना पोटेशियम की कमी से होता है।

आम में निक्रोसिस’ रोग बोरोन की कमी से होता है।

आम में लीफ स्कोर्च’ रोग क्लोराइड की कमी से होता है।

कटहल का आन्तरिक उतक/क्षय रोग बोरान की कमी से होता है।

आम का काला शिरा रोग’ भट्टे के धुएँ से निकली सल्पफर डाइ आक्साइड से होता है।

पीकन नट में गुच्छा’ रोग जस्ते की कमी से होता है।

शलजम में वाटर कोर’ रोग मैंगनीज की कमी से होता है।

फूलगोभी में व्हीप टेल’ रोग मालीब्डेनम की कमी से होता है।

फूलगोभी में बटनिंग’ रोग नाइट्रोजन की कमी से होता है।

फूलगोभी में ब्राउनिंग’ रोग बोरान की कमी से होता है।

चुकन्दर में हर्ट रफट’ रोग बोरान की कमी से होता है।

मटर में मार्श रोग मैंगनीज की कमी से होता है।

मटर में व्हाइट रफट’ रोग फफूद से होता है।

चुकन्दर में चित्तीदार पीला रोग मैंगनीज की कमी से होता है।

गाजर में कोटरस्पाट’ रोग कैल्सियम की कमी से होता है।

आलू का ब्लैक हर्ट’ रोग भण्डारण में आक्सीजन की कमी से होता है।

मक्का में सफेद बुड’ रोग जस्ते की कमी से होता है।

मूँगफली में टिक्का’ रोग फफूंदमैक्रोफोनिया फैसियोलाई से होता है।

ज्वार चरी में जहरीलापन रोग प्रूसिक अम्ल की अधिकता से होता है।

धान्य में ‘Reclaimation’ रोग कापर की कमी से होता है।

धान में झौंकालीफ ब्राउन स्पाट रोग फफूंद से होता है।

बाजरा में ergot एवं स्मट रोग फफूंद से होता है।

गन्ना में रेड रफट रोग फफूंद से होता है।

 

पादप रोग के प्रमुख बिंदु


पादप रोग विज्ञान या फायटो पैथोलाजी शब्द की उत्पत्ति-ग्रीक भाषा के तीन शब्दोपादपरोग तथा ज्ञान से हुई है जिसका अर्थ होता है पादक रोग का अध्ययन।

पादप रोग विज्ञान कृषि विज्ञान वनस्पति विज्ञान अथवा जैव विज्ञान की वह शाखा है जो रोगों के कारणों हेतु की उनकी रोकथाम के अध्ययन करनाइसके साथ रोग नियंत्रण विधियों को विकसित करनना।

पौधों एंव रोग जनक द्वारा विकास की अभिक्रिया का अध्ययन करना।

पादप रोग विज्ञान का उद्देश्य यह है कि पादप रोगों के जीवित अजीविका एवं पर्यावरण कारकों का अध्ययन करना और रोग जनकों द्वारा रोग विकास की अभिक्रिया का अध्ययन करनाइसके साथ रोग नियंत्रण विधियों को विकसित करना।

पौधों एवं रोग जनक द्वारा विकास की अभिक्रिया का अध्ययन करना।

पादप रोगों का अध्ययन करने वाले व्यक्ति पादप रोग विज्ञानी कहलाता है।

आधुनिक वैज्ञानिक विचारधारा के अनुसार पौधों एवं रोगजनक के बीच हुई पारस्परिक क्रियाओं को रोग कहते हैं।

जी.सी कैन्ट के अनुसार - एक विशिष्ट जीव के भीतर उफर्जा के उपयोग से परस्पर सम्बन्धित एक रोगजनक की निरंतर हो रही उत्तेजनाओं के परिणाम स्वरूप योग्यता के हृास अथवा हानि को रोग कहते हैं।

सन् 1846 में आलू की पछेली अंगमारी रोग आयरलैण्ड में महामारी के रूप में उत्पन्न हुआजिससे वहाँ इससे अकाल पड़ गया।

उसी समय पादप-रोग विज्ञान की आधारशिला रख गई।

सन् 1867 में श्रीलंका में काफी कीट का भयंकर प्रकोप हुआ।

सन् 1918-19 में गोदावरी एवं कृष्णा नदियों के डेल्टा क्षेत्र में धान के भूरे-पूर्ण रोग द्वारा धान की सम्पूर्ण फसल नष्ट हो गई।

सन् 1943 में बंगाल में दूर्भिय का कारण माना जाता है।

उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम सन् 1938 में गन्ने का लाल सड़न रोग पादप महामारी के रूप में उत्पन्न हुआ।

थ्रियोफ्रेस्टस ने अपनी पुस्तक में पादप रोग के विषय में अपने अनुभव बताये हैं।

जीव ही रोगी पौधें में स्वतः उत्पन्न हो जाते हैं।

इटली का वनस्पति विज्ञानी माईकेली सबसे पहला व्यक्ति था। जिसने सन् 1729 में कवकों का अध्ययन किया और बीजाणुओं को देखा।

1807 में प्रिवोस्ट ने सिद्ध किया कि गेहूँ का बंट रोग एक कवक के कारण होता है।

आधुनिक प्रयोगात्मक पादप रोग विज्ञान की आधारशिला जर्मन वैज्ञानिक एंटन डी बैरी ने रखी थी।

डी-बैरी ने आलू की पछेती अगमारी रोग पैदा करने वाले कवक का विस्तृत अध्ययन करके उसका नामकरण किया।

जूलियस कून ने सन् 1858 में पादप रोग पर पहली पुस्तक लिखी।

ब्रेफेल्ड ने सन् 1875 में सूक्ष्म जीवों के कृत्रिम संवर्धन की खोज की।

सन् 1878 में अंगूरो के मृदुरोमिल असिता रोग ने अमेरिका से यूरोप में प्रवेश किया।

डी-बैरी द्वारा ही प्रशिक्षित फ़्रांस के प्रो मिलाडेंट ने बोर्डो मिश्रण की खोज की थी।

सर्वप्रथम बिफ्पफेन एवं आर्टन ने धान्य कीटों और कपासतरबूजा लोबिया इत्यादि के म्लानी रोगों का नियंत्रण रोग रोधी किस्मों को विकसित किया।

मेयरपहला व्यक्ति था जिसने पौधों का वाइरस जनित रोग तम्बाकू मोजेक खोजा था।

माइकोप्लाज्मा अनिश्चित आकार के होते हैं। उनके चारों ओर पतली झिल्ली होती है। केंद्रीय झिल्ली अनुपस्थित रहती है।

श्री के.आर कीर्तिकर प्रथम भारतीय वैज्ञानिक थेजिन्होंने यहाँ कवकों को एकत्र करके उसकी पहचान का कार्य आरम्भ किया।

पूसा संस्थान में सन् 1910 में पहले ई.जे बटलर ने भारतीय कवकों से उत्पन्न रोगों का विस्तृत अध्ययन किया।

ई.जे बटलर को भारत में आधुनिक पादप रोग विज्ञान का पिता माना जाता है।

एस.एल0 अजरेकर ने कपास का म्लानिगन्ने का कंड और ज्वार का अर्गट इत्यादि रोगों पर अध्ययन किया।

वी.वीo मुन्दकुर ने इंडियन फाइटोपैथेलाजी का प्रकाशन किया।

यह रोग वह होते हैं जो बहुत अनियमित अन्तरालों और स्थानों पर बहुत थोड़े उदाहरणों के रफप में उत्पन्न होते हैं उसे विरलमारी या विकर्ण रोग कहते हैंजैसे- बाजरे का हरी वाली रोगमूँगफली का तना विगलन रोग।

किट्ट वास्तव में जंग अथवा मुर्चा से है। इसके लक्षण जंग या मुर्चा जैसा होता है जैसे- गेहूँ एवं जौ का कालाभूरा एवं पीला कीट।

श्वेत फफोले रोग क्रूसिफ़ेरी कुल के पौधों पर दिखाई देता है जैसे- श्वेत किट्ट रोग।

पामा- स्कैच शब्द का अर्थ खुरदरापपड़ी जैसा विक्षत अथवा अलसर-सदृश्य है।

कुछ रोगों में पौधों की पत्तियों में लराबदार विरुपित एवं व्याकुल होकर सिकुड़ जाती है। इसे कुचन कहते हैं। जैसे- पपीते का पर्ण कुचन।

ब्लाइट शब्द का अर्थ झुलसी हुई या जली आकृति से है। इससे रोगी पौधों को उतक संक्रमण की तीव्रता के कारण शीघ्र मर जाता है।

शीषरिभी क्षय के कारण पौधों के अंगतनेशाखायें इत्यादि मर कर सूख जाते हैं। उदाहरणनींबू वंशीय फल वृक्षों का शीर्षारभी क्षय।

डा0 राबर्ट कोच को जीवाणु-विज्ञान तकनीक का पिता कहते हैं।

बहुचक्रीय किट्टो को सभी बीजाणु अवस्थाएं पक्सीनिया ऐसीयमयूरीडिनियमटीलियम एवं बेसिडियम उपस्थित होते हैं।

भारत में गेहूँ की फसल पर तीन किट्टों का प्रकोप होता है।

आलू का पछेती रोग एक भयंकर रोग है। इसके आइरिश ब्लाइट के नाम से भी जाना जाता है।

यह रोग फाइटोप्थेरा इन्फेस्टैन्स कवक के कारण होता है।

इस रोग के नियंत्रण के लिए 2.5 मिग्रा डाइथेन एम 45 या डाइथेन जेड-78 नामक दवा का तीन छिड़काव 15 से 20 दिन तक करना चाहिए।

इस रोग के नियंत्रण के लिए लूथरा और सत्तर ने सन् 1934 में सरल उष्ण-जल उपचार विधि को बताया।

किट्टू रोग की रोकथाम के लिए सर्वांगी कवक नाशी रसायन प्लान्टवैक्स तथा विटावैक्स के 0.2 से 0.25% के हिसाब शुष्क बीज उपचार करके बुवाई करते है।

बीज को विटावैक्सबेनलेट बविस्टिन से उपचारित करके बोते हैं।

गेंहूँ का भूरा किट्टू रोग कवक द्वारा होता है। भारत में उत्तरी एवं पूर्वी भागों में यह किट्टू गेहूँ की फसल पर सामान्य रूप से उत्पन्न होता है।

गेहूँ का पीला अथवा धारीदार किट्ट रोग पक्सीनिया स्टिआइफाॅसिस नामक कवक द्वारा होता है।

यह एक भिन्नाश्रयी कवक है। इस कवक के लिए एकान्तर परपोषी का अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया है।

उत्तर प्रदेश में देर से बोई गई गेहूँ की फसल की अपेक्षा अगेती बोई गई फसल में संक्रमण अधिक होता है।

गेहूँ का पीता किट्ट उन क्षेत्रों में कम उत्पन्न होता है। जहाँ वर्षा निम्न तथा गर्मी के दिनों में तापमान अधिक रहता है।

मटर का किट्ट रोग पक्सीनिएसी यूरोमाइसीज द्वारा होता है।

यूरोमाइसीज पोइसाई बृहत्त चक्रीय एवं भिन्नाश्रयी होता है।

इस रोग की रोगरोधी किस्म टाइप-163 को उगाते है।

असली का किट्ट फरवरी महीने में दिखायी देता है।

यह रोग मैलेम्पसोरेसी लीनाई नामक कवक द्वारा होता है।

रोगरोधी किस्म हिराहिमालनी तथा मुक्ता को उगाते है।

यह रोग मैलेम्पसोरेसी लीनाई नामक कवक के द्वारा होता है।

इस किट्ट को रोकने का सबसे सरल एवं उपर्युक्त उपाय रोगरोधी किस्म का प्रयोग करना चाहिए।

गेहूँ का गेगला या सेहूँ का रोग ऐंगुइना ट्रिटिसाई नामक नेमाटोड द्वारा होता है।

धान की भूरी चित्ती रोग हेलमिन्थेस्पोरियम ओराइजी नामक कवक द्वारा होता है।

इसी रोग के कारण बंगाल में सन् 1943 में अकाल पड़ा था।

रोगरोधी किस्में पदमा जया सी.ओ. 20 उगाना चाहिए।

ऐपिफस मेडिस नामक रोग वाहक कीट द्वारा फैलाया जाता है।

आलू का कृष्णागत रोग अ-परजीवी रोग है। जिसका कारण आक्सीजन की कमी से है।

आम का काला सिरा या उतक क्षेय रोग बोरान की कमी से कारण होता है।

इस रोग से बचने के लिए बाग को भट्टे के पास नहीं लगाना चाहिए।

भारत के प्रसिद्ध कीटशास्त्री स्वर्गीय डा प्रधान ने कहा था कि उत्पादन तकनीकी की अपेक्षा संरक्षण तकनीकी अधिक आवश्यक है।

भारत सरकार ने सर्वप्रथम अपना कीट विशेषज्ञ सन् 1901 ई. में लोइनेस डी नाइसविले को नियुक्त किया।

इसका प्रमुख कार्यालय भारतीय संग्रहालय कलकत्ता में था।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की स्थापना 1929 में नई दिल्ली में की गई।

सन् 1936 में पूसा बिहार का अनुसंधान संस्थान भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के नाम से नई दिल्ली में स्थापित हुआ।

सन् 1939 ई. में भारत सरकार ने एक स्थायी टिड्डी चेतावनी एवं नियंत्रण संघ की स्थापना की।



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