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पारिस्थितिकी तंत्र में अजैविक घटकों के प्रति जैविक घटकों की अनुक्रियायें

 

पारिस्थितिकी तंत्र में अजैविक घटकों के प्रति जैविक घटकों की अनुक्रियायें

 

पृथ्वी पर तापमानप्रकाश का वितरणमृदा की बनावटवर्षा का प्रतिरूप एक जैसा नहीं हैं। कहीं गमी र् से झुलसते स्थान है तो कहीं शून्य से भी नीचे तापमान होता है। कहीं घनघोर बारिश होती है तो कहीं बिल्कुल कम बारिश होती है। कहीं प्रचण्ड हवायें चलती है तो कहीं हवा का दबाव अत्यन्त कम होता है।


तात्पर्य है कि पृथ्वी पर स्थित विविध परितंत्रों में जीने लायक अनुकूल स्थितियां है तो चरम परिस्थितियां भी है जहां जीवन अत्यधिक कठिन होता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में जैविक समुदाय अत्यधिक दबाव एवं परम स्थितियों में जीवित रहने के लिए कई सारी युक्तियों का सहारा लेते है अर्थात् विविध अनुक्रियायें करते हैं। चरम स्थिति के प्रति जीवों के विविध अनुक्रियाओं को निम्न बिन्दुओं के तहत देखा जा सकता हैः-

1. समस्थापन - यह ऐसी स्थिति है जिसमें जीव लम्बे समय में स्थायी आंतरिक पर्यावरण विकसित कर लेते हैं। वे शरीर का तापमान तथा तरल पदार्थो का सांद्रण वाह्य परिस्थितियों के विपरीत कर स्वयं को ढाल लेते हैं।

2. नियमन करना - इसके तहत जीव शरीर के तापमान एवं परासरण को एक निश्चित बिन्दु पर ढाल लेते है चाहे वे अंटार्कटिक में रहे या सहारा में रहे। मानव द्वारा अपने शरीर का तापमान 37C  रखना नियमन का ही उदाहरण है। शरीर नियमन द्वारा ही गर्मी में पसीना निकाल कर जाड़े में कंपन्न कर तापमान को अनुकूलित करता है।

3. संरूपण करना - अधिकांश जीव अपने शरीर का तापमान एक निश्चित बिन्दु पर नियमित नहीं  कर पाते जब वे संरूपण की क्रिया अपनाते है। इसके तहत जीव अपने शरीर का तापमान बाह्य परिवेश के तापमान के अनुसार बदलते रहते हैं। जल में रहने वाले अधिकांश प्राणी एवं पादप इसी विधि को अपनाते हैं।

4. प्रवास करना - जब परिवेश ज्यादा प्रतिकूल दबाव में हो जाता है तो जीव अधिक बेहतर क्षेत्रों में प्रवास कर जाते हैं। जैसे-ग्रीष्म ऋतु में साइबेरिया के कड़ाके के ठण्ड से बचने के लिए बहुत सारे पक्षी पक्षी हर वर्ष भारत की ओर प्रवास करते है तथा अनुकूल मौसम पर वापस चले जाते हैं।

5. निलंबित करना - कुछ जीव अपने विपरीत परिवेश के प्रति निलंबित करने का गुण अपनाते है। अर्थात प्रतिकूल परिस्थिति में निष्क्रिय हो जाते हैं तथा अनुकूल स्थिति आने पर सक्रिय हो जाते है। अत्यधिक ठण्ड से बचने के लिए शीतनिष्क्रियता (हाइबर्नेशन) तथा अत्यधिक गर्मी से बचने के लिये कुछ घोंघों एवं मछलियों द्वारा ग्रीष्म निष्क्रियता (अस्टिवेशन) को अपनाना निलंबित करने का ही गुण है। एक मौसमी तालाब जब सूख जाता है तो अनेक पौधे एवं कवक यही विधि अपनाते है। कुछ पौधोंजीवाणुओं एवं कवकों में मोटी भित्ति वाले बीजाणु का बनना निलंबित करने का अन्य उदाहरण है।

6. अनुकूलन - अपने आवास में जीवित रहने के लिए जीव अनुकूलन की प्रक्रिया को अपनाते हैं।

अधिकांश मामलों में अनुकूलन अल्पकाल में न होकर लम्बे समय में होता है और धीरे-धीरे यह आनुवांशिकता स्थिर हो जाता है।


अनुकूलन के कई उदाहरणों को निम्नवत देखा जा सकता है-

(क) मरूस्थलों में रहने वाले अधिकांश पादप तथा जन्तु अनुकूलन की युक्ति द्वारा जीवित रहने का ढंग ढूंढ लेते हैं। अनेक मरूस्थली पौधों की पत्तियों की सतह पर मोटी उपत्वचा (क्यूटिकल) होती है तथा रंध्र गहराई तक होते हैं ताकि वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल की हानि कम से कम हो। उनके प्रकाश संश्लेषी मार्ग विशेष प्रकार के होते है। कुछ मरुस्थली पादपों जैसे- नागफनीकैक्टस आदि में पत्तियाँ कांटों के रूप में रूपान्तरित हो जाती है तथा प्रकाश संश्लेषण चपटे तनों द्वारा होता है।

इनकी जड़े भी गहराई तक गयी होती है ताकि पानी को लम्बे समय तक संरक्षित किया जा सके। इसी तरह मरूस्थली जन्तु अपने मूत्र को सान्द्रित कर जल हानि को रोकते हैं। जल की आपूर्ति आंतरिक वसा का ऑक्सीकरण कर सकते हैं।

(ख) ध्रुवीय प्रदेशों के अति ठण्डी जलवायु में रहने वाले जन्तु भी अनुकूलन अपनाते है। ठण्डे स्थानों पर रहने वाले जीवों जैसे- भालू तथा पैग्विन आदि के बाल दो परत (तह) में होते हैं। त्वचा अधिक वसीय तथा मोटी होती है। पैरों की बनावट भी विशेष प्रकार की होती है। इनके कान एवं पाद काफी छोटे होते हैं ताकि उष्मा की हानि न्यूनतम हो। इसे एलन के नियम से भी जाना जाता है।

(ग) कुछ जीव दबावपूर्ण स्थितियों में शीघ्र कार्यकीय अनुकूल भी अपनाते है तथा दबावपूर्ण स्थितियों को शीघ्रता से सह लेते हैं। जैसे- हम मैदान से अचानक अधिक ऊंचाई (3500 मीटर से ऊपर) पर जायें तो हमें तुंगता बीमारी का अनुभव होने लगता है। इसमें मिचली तथा थकान आती है एवं हृदय स्पन्दन की दर बढ़ जाती है। वायुमण्डलीय दबाव कम होने से शरीर को पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन नहीं मिल पाती। ऐसी स्थिति में शरीर लगभग 24 घण्टे के अन्दर शीघ्र अनुकूलन कर लेता है। हमारा शरीर लाल रूधिर कणिकाओं का उत्पादन बढ़ा देता हैश्वसन की दर बढ़ा देता है तथा हीमोग्लोबिन की बंधनकारी क्षमता का घटा देता है अतः कम आक्सीजन मिलने के बावजूद हम शीघ्र वहाँ रहने के लिए अनुकूलित हो जाते हैं। इसी प्रक्रिया का परिणाम है कि ऊँचाई पर रहने वाले लोगों में मैदानी लोगों की अपेक्षा लाल रूधिर कणिकाओं की संख्या (हीमोग्लोबिन) अधिक मात्रा में होती है।



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